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August 12, 2026

बिना चेतावनी, बस पानी

असम के शिवसागर जिले में नाजिरा कस्बे से कोई 12 किमी दूर नेपालीखुटी गांव में सन्नाटा पसरा है. सैकड़ों परिवार हफ्ते भर से भी ज्यादा वक्त से तिरपाल के नीचे रह रहे हैं. उनके घर कीचड़ में दबे हैं, हवा में मरे हुए मवेशियों की दुर्गंध है, और सड़कें बंद हैं. नेपालीखुटी नगालैंड की सीमा से सटा असम का आखिरी गांव है. बाढ़ आने से पहले उसे कोई चेतावनी नहीं मिली. किसान विनोद शर्मा का कहना है कि 19 जुलाई को वे उफान पर बह रही डिखो नदी देखने गए थे, पर वह उतनी खतरनाक दिखाई नहीं दी. वे बताते हैं, "लेकिन बाढ़ का पानी अचानक आ गया. पानी का स्तर इतनी तेजी से बढ़ा कि मुझे समझ ही नहीं आया कि क्या करूं." असम में बाढ़ हर साल आती है. राज्य ने ऐसे भी साल देखे जब बाढ़ से बड़ी तादाद में लोग मारे गए, इस साल की बाढ़ इलाकों और रफ्तार की वजह से अलग थी. शिवसागर, चराइदेव और जोरहाट ब्रह्मपुत्र नदी के दक्षिणी किनारे पर बसे हैं. यह जमीन बाढ़ के सामान्य स्तर से ऊंची मानी जाती है. ऊपरी असम के तीन पड़ोसी जिलों के 6,78,000 लोग, यानी राज्य में कुल प्रभावित लोगों के 94 फीसद से भी ज्यादा, 23 जुलाई को बाढ़ की चपेट में थे. 78 लोगों की मौत हो चुकी है और 40 का अब भी कोई अता-पता नहीं. पूरे असम में करीब 49,000 हेक्टेयर फसल भूमि पानी में डूबी थी, 88,000 से ज्यादा मवेशी प्रभावित थे और 26,500 से ज्यादा पशु मारे गए. बाढ़ के अचानक आने की वजह असम से बाहर थी. असम कृषि विश्वविद्यालय के कृषि-मौसम विभाग के प्रमुख राजीव लोचन डेका कहते हैं, "यह अचानक बाढ़ 18-20 जुलाई को नगालैंड के मोन, वोखा, लौलेंग और मोकोकचुंग जिलों में बहुत ज्यादा बारिश होने की वजह से आई. इससे निचले इलाकों की तरफ पानी का तेज बहाव शिवसागर, जोरहाट और चराइदेव में आ घुसा." असम में भी भारी बारिश हो रही थी. चराइदेव जिले के सोनारी कस्बे में अकेले 18 जुलाई की रात 190 मिमी बारिश हुई. जलभराव के क्षेत्र मॉनसून से पहले की बारिश से पूरी तरह भीग चुके थे और हालत यह थी कि वे पानी सोखने के बजाए छोड़ रहे थे. डेका बाढ़ की स्थिति बदतर होने की कुछ और वजहें भी बताते हैं. वे हैं जंगलों की कटाई, प्राकृतिक वेटलैंड या तरभूमि का खत्म होना और सड़कों का निर्माण असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने सारा दोष बहुत ज्यादा बारिश पर महा. मोकोकचुंग में सामान्य से 493 फीसद और चराइदेव में सामान्य से 436 फीसद बारिश हुई. इसने उफान पर वह रही ब्रह्मपुत्र की सहायक नदियों के पानी को बाहर निकलने से रोक दिया. असम के कृषि, सिंचाई और संसदीय कार्य मंत्री पीयूष हजारिका ने 23 जुलाई को विधानसभा में कहा कि यह पूर्वी असम की 60 बरसों की भीषणतम बाढ़ थी. नहीं सीखे सबक क्या यह विनाश रोका जा सकता था? आइआइटी रुड़की में एडजंक्ट प्रोफेसर और नदी इंजीनियर नथन शर्मा को लगता है कि इतने बड़े पैमाने पर तबाही से शायद बचा जा सकता था. उनका कहना है कि बाढ़ का पहले से अनुमान न लगाकर चेतावनी जारी न कर पाना मुख्य नाकामी थी. देश की उपग्रह व्यवस्थाएं मौसम की ऐसी प्रणालियों का पता अब घंटों और कभी-कभी दिनों पहले लगा सकती हैं. लेकिन असम का पूर्व चेतावनी नेटवर्क इतनी अच्छी तरह जुड़ा नहीं था कि इन जानकारियों का इस्तेमाल कर पाता. शर्मा कई उपाय सुझाते हैं: जियोसिंथेटिक और आर्टिकुलेटेड कंक्रीट ब्लॉक से तटबंधों को मजबूत करें, प्राकृतिक निचले बिंदुओं पर जलनिकासी के रास्ते बनाएं, और बहुत ज्यादा गाद से भरी भोगदोई नदी को साफ करें. उनकी सबसे जरूरी सिफारिश यह है: जल-विभाजक क्षेत्रों में 100 फीसद जंगल उगाएं, ये सिफारिशें नई नहीं हैं. भाजपा 2016 में असम को बाढ़ मुक्त बनाने के वादे के साथ राज्य की सत्ता में आई थी. 1990 के दशक में लिविंग विद फ्लड्स नाम की एक योजना लाई गई थी. पर बाद में भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद वापस ले ली गई. विशेषज्ञों का कहना है कि ज्यादा बड़ी समस्या उस नजरिए में है जो बाढ़ के उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान करता है और सारे संसाधन केवल उन्हीं क्षेत्रों में झोंक देता है. इसकी वजह से कम जोखिम वाले माने गए जिले उस वक्त कतई तैयार नहीं होते जब उन्हें अचानक बड़ी बाढ़ का सामना करना पड़ता है.

आगे बड़ी चुनौतियां

धर्मेंद्र प्रधान 27 जुलाई की सुबह 10.40 बजे जिस वक्त संसद भवन में दाखिल हुए, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सांसद उनका स्वागत करने के लिए आ जुटे. उन्होंने पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री को मैथिली टोपी पहनाई और शॉल ओढ़ाकर धर्मेंद्र प्रधान जिंदाबाद के नारों के साथ उन्हें सदन के भीतर ले गए, प्रधान ने 48 घंटे पहले सड़क पर विरोध-प्रदर्शनों के दबाव में इस्तीफा दे दिया था. यह कुछ-कुछ वैसा ही था, जैसे किसी नेता का स्वागत किसी विजय से लौटने पर किया जाता है. लेकिन यह सब विपक्ष से ज्यादा भाजपा काडरों को दिखाने के लिए था. किसी बड़े आंदोलन की वजह से किसी मंत्री का पद छोड़ना कुछ इस तरह की स्थिति है, जिसका सामना सत्तारूढ़ पार्टी ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2014 की शानदार जीत के बाद शायद ही कभी किया हो. प्रधानमंत्री का प्रधान को शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा देने के लिए कहने से पार्टी कार्यकर्ता शायद हतोत्साहित महसूस कर रहे थे. ऐसे में उनकी आहत भावनाओं पर मरहम लगाषा जाना जरूरी था. ठीक उसी तरह जैसे कि नेशनल एलिजिबिलिटी-कम-ट्रेंस टेस्ट (नीट) में बड़ी चूकों को लेकर फैले जेन जी के व्यापक गुस्से को शांत किया गया. कदम पीछे हटाने की इस घटना की तुलना सिर्फ नवंबर 2021 में कृषि कानूनों की वापसी से हो सकती है, लेकिन वह भी साल भर से ज्यादा चले किसानों के लगातार विरोध के बाद हुआ था. प्रधान से इस्तीफा लेने के अलावा मोदी ने परीक्षा में होने वाली गड़बड़ियों के लिए संसद में एक नया कड़ा कानून पारित कराया और नंदन नीलेकणि की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय टास्क फोर्स भी बनाई आइटी जगत के दिग्गज और आधार परियोजना के वास्तुकार नीलेकणि की यह टास्क फोर्स नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) की ओर से कराई जाने वाली परीक्षाओं की व्यवस्था में सुधारों की सिफारिश करेगी, जिसमें नीट भी शामिल है. लेकिन नीट विवाद तो मोदी के सामने मौजूद संकटों में से सिर्फ एक है. आगे राजनीति, अर्थव्यवस्था और राजकाज से जुड़ी कई और गंभीर चुनौतियां खड़ी हैं- उनमें अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी की हाल ही की शर्मिंदगी से पार्टी की छवि को बचाना भी कम अहम नहीं, जिसकी वजह से दो प्रमुख ट्रस्टियों को इस्तीफा देना पड़ा. 1. जेन जी का भरोसा जीतना प्र धानमंत्री को जो बात परेशान कर रही होगी वह यह नहीं कि नीट आंदोलन भड़क गया, बल्कि यह कि वे खुद उसे शांत नहीं कर पाए, आखिर देश में किसी भी और नेता ने इस वर्ग पर इतनी मेहनत नहीं की हैः मसलन, हर परीक्षा सीजन में परीक्षा पे चर्चा, खिलाड़ियों के साथ उपस्थिति, 75 साल के नेता के ई-स्पोर्ट्स खेलने के वीडियो, नई टेक्नोलॉजी के प्रति व्यवस्थित खुली सोच. लेकिन जब नीट लीक और परीक्षा रद्द करने पर जवाबदेही की कमी के खिलाफ जेन की का गुस्सा फूटा तो उसने उनकी विश्वसनीयता के मूल आधार पर ही गहरी चोट की. मोदी को उम्मीद है कि नीलेकणि की अगुआई वाली टास्क फोर्स की घोषणा जेन जी की नाराजगी कम करने में काफी मदद करेगी. प्रधानमंत्री ने युवाओं को भरोसा दिलाया है कि प्रस्तावित टेक्नोलॉजी आधारित बदलाव परीक्षा व्यवस्था को भरोसेमंद, पारदर्शी और टेक-सैवी बनाएगा, साथ ही उसे चलाने वाली एजेंसी की संरचना भी बदलेगी. टास्क फोर्स में इसरो के पूर्व अध्यक्ष एस. सोमनाथ, इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व निदेशक तपन डेका, आइआइटी मद्रास के निदेशक वी. कामकोटि, पूर्व शिक्षा सचिव अनिता करवाल और लॉजिस्टिक्स विशेषज्ञ अमृत लाल मीणा शामिल हैं. ऊपरी तौर पर यह नीट विवाद पर मजबूत प्रतिक्रिया लगती है. लेकिन इससे पहले सुधारों के दो विस्तृत खाके आ चुके हैं. 2024 में बनी के. राधाकृष्णन समिति रिपोर्ट और उसके अगले साल संसदीय प्रवर समिति की रिपोर्ट. दोनों ने एनटीए की खामियों की पहचान की और परीक्षा लीक रोकने के ठोस उपाय सुझाए, उन सिफारिशों में से ज्यादातर पर अब भी अमल बाकी है. प्रश्नपत्रों पर राधाकृष्णन पैनल के प्रस्ताव बेहद खास थे. उसने जांचे-परखे विशेषज्ञों का भरोसेमंद पूल बनाने, प्रश्न-पत्र तैयार करने वालों और कॉपियां जांचने वालों के चयन के स्पष्ट नियम बनाने, उन्हें जाहिर न करने और किसी तरह के हित न टकराने संबंधी करार करने की बात कही गई थी. बेहतर हो कि प्रश्न-पत्र तैयार करने वाले अपने गृह नगरों में काम न करें, इस तरह की शर्त रखी गई थी. यह भी कि कई प्रश्नपत्र तैयार करने के लिए अलग-अलग टीमें हों, और भाषा विशेषज्ञ प्रमाणित करें कि किसी बाहरी व्यक्ति ने कंटेंट नहीं देखा. पैनल ने बड़े प्रश्न बैंक भी बनाने को कहा, जिनसे सुरक्षित और रैंडमाइज्ड (बेतरतीब) पद्धति के जरिए प्रश्न-पत्र तैयार किए जा सकें. इससे किसी एक विशेषज्ञ के लिए यह जान पाना आसान नहीं रह जाएगा कि अंतिम प्रश्न-पत्र क्या बना. इन प्रस्तावों में ठीक उन्हीं बिंदुओं पर उंगली रखी गई थी, जो 2026 में नीट पेपर लीक के मामले में कथित तौर पर हुआ. दस्तावेजों में दर्ज जांच के मुताबिक, कुछ विशेषज्ञ प्रश्न-पत्र तैयार करने और उसे अनुवाद करने, दोनों की जिम्मेदारियां निभा रहे थे, जिससे एक छोटे समूह को परीक्षा के बड़े हिस्से की जानकारी उपलब्ध थी. जिम्मेदारियां अलग-अलग देने, हितों के टकराव पर नजर रखने, सुरक्षित प्रश्न बैंक और बेतरतीब चयन-प्रक्रिया जैसी सुझाई गई व्यवस्था का पालन हुआ होता तो कथित अंदरूनी लोगों को शायद कभी पता ही नहीं चलता कि कौन-से सवाल आएंगे, और पेपर लीक को शायद रोका जा सकता था. राधाकृष्णन समिति की 101 सिफारिशों में से सरकार ने स्वीकार तो सभी को कर लिया है लेकिन अब तक अमल सिर्फ 57 पर किया है. जिन उपायों में देरी हुई है, उनमें बहुत बड़ी परीक्षाओं के लिए मल्टी-सेशन टेस्टिंग, मल्टी-स्टेज नीट-यूजी और वे हाइब्रिड मॉडल शामिल हैं, जिसमें एन्क्रिप्टेड पेपर डिजिटल रूप से भेजे जाते हैं और परीक्षा केंद्र पर छापे जाते हैं. 2025 में लागू सुधारों ने प्रश्न-पत्रों को पहुंचाने की श्रृंखला को मजबूत किया, लेकिन प्रश्न-पत्र तैयार करने के मामले को काफी हद तक ज्यों का त्यों रहने दिया. 2026 में व्यवस्था में छेद ठीक वहीं हुआ. लिहाजा, नई टास्क फोर्स को अपने काम की शर्तें साफ करनी होंगी, यह ऑडिट करना होगा कि पहले की सिफारिशें लागू क्यों नहीं हुईं, और राधाकृष्णन समिति की सिफारिशों को ऑपरेशनल खाके में बदलना होगा. वरना इस टास्क फोर्स का गठन अशांत सड़कों को शांत करने की रणनीतिक चाल से ज्यादा कुछ नहीं लगेगा. जेन जी का भरोसा जीतने के लिए मोदी को मौजूदा नीट संकट ही नहीं, बल्कि शिक्षा और रोजगार-नौकरियों के बीच असंतुलन के बड़े मुद्दे को भी दुरुस्त करना होगा. जरा ये आंकड़े देखिए: जून 2026 के पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे में 15 से 29 वर्ष के युवाओं में बेरोजगारी 16.2 फीसद बताई गई है, जबकि कुल बेरोजगारी दर 5.5 फीसद है; शहरी भारत में यह आंकड़ा और ज्यादा 18.2 फीसद है और युवा महिलाओं के लिए 25 फीसद से ऊपर है. सालाना डेटा तो और भी निराशाजनक है. 2025 में माध्यमिक शिक्षा और उससे ऊपर वालों में बेरोजगारी 6.5 फीसद थी, जबकि निरक्षरों में यह 0.3 फीसद थी. रोजगार-नौकरी के लिए हुनर की खाई पाटने की मोदी की अपनी पहलकद‌मियां भी अब तक अपेक्षित असर वाली नहीं रही हैं, जिसकी सबसे बड़ी मिसाल प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना है. इस योजना के पहले तीन पायलट चरणों में कंपनियों ने करीब 1.65 लाख पेशकश की. लेकिन सिर्फ 16,000 से कुछ ज्यादा युवाओं ने ही इसमें हिस्सा लिया यानी आवेदन करने वालों का करीब डेढ़ फीसद इस साल अप्रैल से यह योजना एमएसएमई, ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटरों और वैधानिक निकायों के लिए खोली गई, और मासिक वजीफा 5,000 रुपए से बढ़ाकर 9,000 रुपए किल्या गया. सरकार को शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव लाना होगा, जिसमें व्यावसायिक हुनर और अपग्रेड 2. अर्थव्यवस्था को रफ्तार देना क बई लोगों के लिए एक बात एक अबूझ पहेली बनी हुई हैः जिस अर्थव्यवस्था के बारे में कहा जाता है कि वह सात फीसद से ज्यादा की दर से बढ़ रही है, वह व्यापक समृद्धि का एहसास क्यों नहीं दे पाई. केंद्र की ओर से बड़े पैमाने पर सार्वजनिक खर्च के जरिए निवेश चक्र शुरू करने की लगातार कोशिशों के बावजूद निजी निवेश सुस्त बना हुआ है. देश को अपने जनसंख्या लाभांश का फायदा उठाने में भी ज्यादा कामयाबी हाथ नहीं लगी है क्योंकि हर साल कार्यबल में प्रवेश करने वाले करीब 1.2 करोड़ लोगों के लिए पर्याप्त नौकरियां पैदा नहीं हो पा रहीं. वह मैन्युफैक्चरिंग में भी कोई खास बदलाव लाने में कामयाब नहीं हो पाई है, जिसका जीडीपी में हिस्सा वर्षों से महज 16-17 फीसद पर अटका हुआ है. इसमें दो राय नहीं कि पश्चिम एशिया की जंग अर्थव्यवस्था के लिए भारी पड़ रही है. भारत अपने कच्चे तेल कर करीब आधा हिस्सा, प्राकृतिक गैस का 60 फीसद और लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) का 90 फीसद इसी क्षेत्र से आयात करता है. देश के यूरिया आयात का दो-तिहाई हिस्सा भी वहीं से आता है. अमेरिका-ईरान संघर्ष के दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से भारत की सप्लाइ पहले ही बाधित हो चुकी थी; अब लाल सागर तट के पास सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठानों पर हूती विद्रोहियों के हमलों ने बाब अल-मंदेव जलडमरूमध्य से होने वाले शिपिंग ट्रैफिक को प्रभावित किया है. 23 जुलाई को ब्रेंट क्रूड मई के बाद पहली बार 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया. ज्यादातर विश्लेषकों का अनुमान है कि इस वित्त वर्ष में यह 80-85 डॉलर के दायरे में रहेगा, जो पिछले वित्त वर्ष से 15 फीसद तक ज्यादा है. ईरान बुद्ध के दौरान केंद्र ने ईंधन की कीमतों में कई बार बढ़ोतरी की, जिससे पेट्रोल और डीजल दोनों में कुल मिलाकर 7.50 रुपए प्रति लीटर की वृद्धि हुई. कच्चे तेल की कीमतें अब भी अस्थिर बनी हुई हैं, इसलिए सरकार इन बड़े हुए दामों को वापस लेने की जल्दी में नहीं होगी. ईंधन की अधिक कीमतों का अर्थव्यवस्था पर सिलसिलेवार असर पड़ता है, इनपुट लागत बढ़ती है और उसके बाद वस्तुएं और सेवाएं महंगी हो जाती हैं. खाद्य महंगाई में बढ़ोतरी के साथ मिलकर उसने जून में खुदरा महंगाई को 18 महीनों की सबसे तेज वृद्धि की बुलंदी पर पहुंचा दिया. भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने अनुमान जताया है कि मौजूदा वित्त वर्ष में महंगाई की दर पांच फीसद से ऊपर बनी रहेगी. खाड़ी बुद्ध ने रुपए पर भी दबाव डाला था, जो 20 मई को डॉलर के मुकाबले करीच 97 तक गिर गया बुद्ध के दौरान भारत के आयात की बढ़ती लागत ने चालू खाते के घाटे (देश के निर्यात और आयात के मूल्य के अंतर) को चढ़ा दिया, जबकि घटते शुद्ध एफडीआइ और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशों की बढ़ी निकासी ने पूंजी खाते को प्रभावित किया भुगतान संतुलन के मोर्चे पर संकट तब साफ दिखने लगा जब 10 मई को प्रधानमंत्री मोदी ने देश के लोगों से ईंधन, सोना और विदेशी यात्रा पर खर्च कम करने की अपील की, ताकि विदेशी मुद्रा को बाहर जाने को रोका जा सके. इस बीच रिजर्व बैंक ने रुपए को सहारा देने के लिए अपने भंडार का जमकर इस्तेमाल किया, जिससे देश का विदेशी मुद्रा भंडार फरवरी 2026 के 728.5 अरब डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर से घटकर जुलाई 2026 के आखिर तक करीब 676.2 अरब डॉलर रह गया. विशेषज्ञों के मुताबिक, पश्चिम एशिया युद्ध के बाद सरकार की प्राथमिकताएं कृषि, एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उहाम), पर्यावरण और वैकल्पिक ऊर्जा होनी चाहिए, कृषि में ध्यान उत्पादकता बढ़ाने, वैल्यू. ऐडेड उत्पादों को बढ़ावा देने, बर्बादी कम करने और निर्यात चढ़ाने पर होना चाहिए, साथ ही इस क्षेत्र को जलवायु परिवर्तन की अनिश्चितताओं के प्रति ज्यादा मजबूत बनाना होगा. एमएसएमई सबसे ज्यादा नौकरियां पैदा करते और लोगों को काम में लेते हैं, इसलिए विशेषज्ञों का कहना है कि उस मामले में ध्यान कौशल निर्माण पर होना चाहिए, ताकि उम्मीदवार नौकरियों के लिए उपयुक्त बन सकें. 3. परिसीमन बिल पास कराना य बह वह परीक्षा है, जिसे मोदी ने खुद खुद अपने लिए तथ किया है-और यह ऊंचे दांव वाली बाजी है. भाजपा नेतृत्व ऐसी संवैधानिक जीत की तलाश में है, जो पार्टी काडर में पर्याप्त ऊर्जा भर सके और राष्ट्रीय विमर्श को जंतर मंतर से दूर ले जा सके. परीक्षा संशोधन पर 10 घंटे की बहस सिर्फ शुरुआत थी, जिसमें तेजस्वी सूर्या और बांसुरी स्वराज जैसे युवा सांसदों को आगे किया गया. असली मुकाबला अमित शाह के गृह मंत्रालय की अगुआई में आगे बढ़ाए जा रहे दो संवैधानिक उपायों में है. पहला है एक देश, एक चुनाव संशोधन, जिसका उद्देश्य आम चुनाव और राज्य चुनाव साथ-साथ कराना है. रामनाथ कोविंद समिति से मंजूरी मिलने के बाद उसे दिसंबर 2024 में लोकसभा में पेश किया गया था और अब उस पर संयुक्त संसदीय समिति में मंत्रणा का इंतजार किया जा रहा है. दूसरा है संसदीय सीटों के परिसीमन को लेकर नथा जोर, जो राजनैतिक रूप से बेहद पेचीदा कवायद है. 2029 से संसद में महिलाओं के लिए 33 फीसद आरक्षण के किए गए वादे को लागू करने और लोकसभा की कुल सीटें 550 से बढ़ाकर 850 करने से पहले यह जरूरी होगा, अप्रैल में सरकार ने इसी मकसद से विशेष सत्र नहीं जुटा पाई थी. तब से सरकार का समीकरण बेहतर हुआ है. 4 मई को पश्चिम बंगाल में भाजपा की भारी जीत की बदौलत इस पूर्वी राज्य में उसकी पहली बार सरकार बनी, जिसमें उसने 294 में से 207 सीटें जीतीं. उसके बाद तृणमूल कांग्रेस में टूट हुई, जिसने करीब 20 लोकसभा सांसदों और चार राज्यसभा सदस्यों को ममता बनर्जी से दूर कर दिया. तृणमूल के बागी लोकसभा सदस्यों ने एनडीए को समर्थन का संकेत दिया है, जबकि ऊपरी सदन के सदस्य सीधे भाजपा में शामिल हो गए, उद्धव ठाकरे के छह सांसद एकनाथ शिंदे की शिवसेना में चले गए हैं. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के शरद पवार धड़े के आठ सांसदों को सुनेत्रा पवार के गुट में मिलाने को लेकर बातचीत चल रही है. द्रविड़ मुनेत्र कलगम (द्रमुक), जो अब इंडिया (इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्लूसिव अलायंस) ब्लॉक से बाहर है, कुछ खास मुद्दों पर समर्थन कर सकती है. एम. के. स्टालिन विधानसभा चुनाव विजय की तमिलगा वेत्रि कलगम (टीवीके) से हार चुके हैं, वे नई राज्य सरकार की जांचों से बचाव के लिए किसी राष्ट्रीय पार्टी की छत्रछाया चाहते हैं, और भाजपा के रणनीतिकार उन्हें बता रहे हैं कि नए बिल में 50 फीसद फॉर्मूला शामिल होगा. युवजन श्रमिक रायतू कांग्रेस पार्टी, जिसने अप्रैल में भी बिल का समर्थन किया था, और झारखंड मुक्ति मोर्चा भी इसी सूची में हैं. फिर भी यह नाकाफी है. निचले सदन में एनडीए के पास 318 सदस्य हैं, जबकि दो-तिहाई बहुमत के लिए 360 की जरूरत है. अगर हर नया घटक सरकार के साथ वोट करे, तब भी संख्या करीब 355 तक पहुंचती है. यानी अब भी पांच सदस्य कम हैं और उनकी तलाश जारी है. एक तकनीकी बात मदद कर सकती है. अनुच्छेद 368 में प्रत्येक सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत के साथ उपस्थित और मतदान करने वालों के दो-तिहाई समर्थन की जरूरत होती है, जिसका मतलब है कि अनुपस्थिति भी लगभग उतनी ही अहम है जितना किसी का समर्थन में आ जाना. इस समय चल रही सौदेबाजी का बड़ा हिस्सा इस पर नहीं है कि कौन हां में वोट देगा, बल्कि इस पर है कि किसे उस रोज कहीं और रहने के लिए राजी किया जा सकता है. मोदी के लिए यह फिर से अपने पुराने रूप में दिखने का सबसे साफ उपलब्ध रास्ता है. एक देश, एक चुनाव और महिला आरक्षण प्रधानमंत्री के संवैधानिक एजेंडे के दो स्तंभ हैं. विपक्ष के लिए उनका खुलकर विरोध करना आसान नहीं लगता, हालांकि परिसीमन पर वह विरोध में है. अगर मोदी इनमें से किसी एक एजेंडे को भी आगे बढ़ाने में सफल होते हैं, तो यह तय करेगा कि मोदी 3.0 बदलावकारी परिवर्तन दे सकता है या सिर्फ संकटों को संभाल सकता है. नीट पर पीछे हटने के बाद चार महीनों के भीतर दूसरी नाकामी मोदी सरकार की साख के लिए गंभीर झटका होगी. 4. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव जीतना क और परीक्षा ऐसी है, जिसे मोदी किसी और को नहीं सौंप सकते, क्योंकि यह उस एक कौशल पर टिकी है, जिसमें उन्होंने लगातार महारत दिखाई है: ए चुनाव जीतना. 2027 में सात राज्यों में चुनाव होंगे. उनमें से पांच-उत्तर प्रदेश, गुजरात, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर -भाजपा-शासित हैं, जबकि छठा, पंजाब, इस समय आम आदमी पार्टी के शासन में है. उनमें सबसे बड़ा पुरस्कार निस्संदेह उत्तर प्रदेश है, जिसके पास 80 लोकसभा सीटें और 403 सदस्यीय विधानसभा है. लेकिन इस राज्य का महत्व सिर्फ संख्या तक सीमित नहीं. उत्तर प्रदेश में भाजपा की आरामदायक जीत देशभर में पार्टी काडर का मनोबल बढ़ाएगी और यह मजबूत संदेश देगी कि 2024 एक खराब दौर भर था, कोई राजनैतिक मोड़ नहीं. लेकिन करीबी मुकाबला उनके लिए इसका उलटा संकेत देने वाला होगा. पार्टी बहुत अच्छी तरह जानती है कि उसकी जमीन कब खिसकी. 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से सिर्फ 33 जीत पाई, और उसका वोट शेयर करीब 41 फीसद रहा. यह 2019 में मिली 62 सीटों के मुकाबले तेज गिरावट थी और मोदी युग में राज्य में उसका सबसे कमजोर प्रदर्शन. समाजवादी पार्टी (सपा) ने 37 सीटें जीतीं, जबकि इंडिया ब्लॉक 43 पर जा पहुंचा. ज्यादा नुक्सानदेह फैजाबाद की हार थी, वह सीट जिसमें अयोध्या आता है. वह भी प्रधानमंत्री की ओर से राम मंदिर के उद्घाटन के महज छह महीने बाद ही. उस हार ने दिखाया कि भाजपा के लिए मंदिर का मुद्दा स्थायी चुनावी लाभ देने वाला नहीं हो सकता. इस साल गर्मी में मंदिर परिसर में चढ़ावा चोरी विवाद ने मामला और उलझा दिया है क्योंकि लोग अब राम मंदिर निर्माण, जिसको पार्टी की निर्णायक उपलब्धि माना जा रहा था, से हटकर कुप्रबंधन के सवालों की चर्चा करने लगे हैं. चुनौती अब ऐसा मुद्दा खोजने की है जो उत्तर प्रदेश में राम मंदिर जैसी ही भावनात्मक गूंज पैदा कर सके. वर्ष 2024 के बाद जो कुछ हुआ, उसमें से कुछ की पहले कल्पना भी करना मुश्किल था. पार्टी ने जाति जनगणना को अपना लिया, जिसका उसके अपने कई नेता वर्षों से विरोध करते आ रहे थे. राज्य में भाजपा की मजबूत बूथ मशीनरी के वास्तुकार सुनील बंसल को राष्ट्रीय भूमिका में भेज दिया गया. योगी आदित्यनाथ को वरिष्ठ नौकरशाहों की नियुक्ति में ज्यादा छूट दी गई. भाजपा के भीतर इसमें कम ही संदेह है कि मोदी के बाद योगी राज्य के सबसे प्रभावी वोट जुटाने वाले नेता हैं. लेकिन उन पर एक दशक के शासन का बोझ भी है-ऐसी सत्ता-विरोधी भावना, जिसे उत्तर प्रदेश के किसी मुख्यमंत्री ने पहले सफलतापूर्वक पार नहीं किया. और पिछले दो महीनों ने ठीक उसी आकांक्षी तबके, ऊंची जाति, शहरी और युवा मतदाता वर्ग की परीक्षा ली है, जो पारंपरिक रूप से उसका समर्थन करता रहा है. हालांकि उत्तर प्रदेश में भाजपा रणनीतिकारों को जो बात परेशान कर रही है, वह सत्ता-विरोधी भावना या गुटबाजी नहीं बल्कि गणित है. 2022 में भाजपा और उसके सहयोगियों ने 43.8 फीसद वोट हासिल किए थे, जबकि सपा गठबंधन को 36.3 फीसद वोट मिले. लेकिन सिर्फ अंतर नतीजे को नहीं समझाता. बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को 12.9 फीसद वोट मिले, लेकिन वह उसे सीटों में तब्दील नहीं कर पाई. यही अटका हुआ वोट, जो आरक्षित सीटों और पूर्वी यूपी में केंद्रित था, भाजपा को वह कुशन देता था जिसकी मदद से वह बंटे हुए विपक्ष के मुकाबले कई करीबी सीटों पर आगे निकल सकी. अब यह कुशन घट रहा है. 2024 में बसपा एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत पाई और उसका वोट शेयर इकाई अंक में चला गया. उसके कई जिला-स्तरीय संगठक और दूसरी पंक्ति के नेता-आर.के. चौधरी, जो अब कांग्रेस के सांसद हैं, इंद्रजीत सरोज और लालजी वर्मा - सपा प्रमुख अखिलेश यादव के करीब आगए हैं. वे अपने साथ सिर्फ वोट नहीं लाते, बल्कि उन्हें जुटाने वाली संगठनात्मक मशीनरी भी लाते हैं: बूथ कमेटियां और स्थानीय नेता, जिन्हें पता है कि मतदान के दिन किस गली के किन घरों से वोट निकलते हैं. इसका मतलब है कि मार्च 2027 में उत्तर प्रदेश को बचाए रखने के लिए मोदी सिर्फ अपने आधार को संभालकर ही नहीं आश्वस्त हो सकते; उन्हें उसको और फैलाना होगा. यकीनन, यह एक कठिन चुनौती है, जिसके लिए अपने नैरेटिव को हावी करवाना, जमीन पर भाजपा और संघ के कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भरना और गुटबाजी पर काबू पाना जरूरी होगा. लेकिन इसके लिए अनुकूल माहौल तभी तैयार हो सकता है, जब मौजूदा संकटों से सफलतापूर्वक निबटा जा सके. 5. आरएसएस को खुश रखना भा जपा और मोदी को जिस बात से ज्यादा परेशानी होनी चाहिए, वह है पूरे जेन जी आंदोलन के दौरान व्यापक संघ परिवार की साफ दिखती खामोशी. पहले की लड़ाइयों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े संगठन जवाबी नैरेटिव बनाने, समर्थन जुटाने या अपना जनबल सड़कों पर उतारने के लिए भरोसेमंद माने जाते थे. इस बार ऐसे किसी दखल का बहुत कम संकेत दिखा. कई भाजपा कार्यकर्ताओं ने इसका निष्कर्ष यह निकाला कि सरकार को मार अकेले ही झेलने के लिए छोड़ दिया गया. हालांकि खामोशी पूरी तरह नहीं थी. 24 जुलाई को प्रधान के इस्तीफे से एक दिन पहले, आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत ने दिल्ली के आंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में समकालीन मातृत्व पर विश्व मांगल्य सभा की राष्ट्रीय बैठक के समापन सत्र में कहा कि उनकी पीढ़ी आज्ञाकारिता की संस्कृति में बड़ी हुई थी, लेकिन आज के युवा अलग हैं. वे सवाल पूछते हैं और उन्हें वजह बतानी पड़ती है तथा स्नेह और समय देना पड़ता है. उन्होंने जंतर मंतर का कोई जिक्र नहीं किया, लेकिन मोदी के लिए संदेश साफ था. अरुण कुमार तब से एक दूसरा स्वरूप भी चर्चा में है कि संघ अनुपस्थित कम, असहमत ज्यादा था. सूत्रों के मुताबिक, 20 जुलाई के बाद प्रधानमंत्री तक साफ फीडबैक पहुंचा कि पुलिसिया कार्रवाई ने भाजपा के मूल समर्थक वर्ग के कुछ हिस्सों के साथ दरार पैदा कर दी है. आरएसएस खुद अपने शताब्दी वर्ष के करीब पहुंचते हुए जेन जी तक पहुंचने की बड़ी पहल कर रहा है. उसके उस अभियान के लिए यह संदेश तो कतई जरूरी नहीं था कि जिस सरकार को बनाने में उसने मदद की, उसे राष्ट्रीय राजधानी में छात्रों के खिलाफ आंसू गैस, लाठी और पैलेट गन का इस्तेमाल करते देखा गया. जानकारों के मुताबिक, दोनों व्याख्याएं मोदी के लिए समस्या पैदा करती हैं. लेकिन दूसरी ज्यादा महत्वपूर्ण है. संघ ने भले भाजपा नेतृत्व से आंशिक रूप से सुलह कर ली हो, अहम राज्यों में अपने कार्यकर्ताओं को पार्टी मशीनरी के पीछे लगा दिया हो और कुछ राज्य इकाइयों में उसकी राय चली हो, लेकिन उसने अपनी नाराजगी छिपाने की कोशिश नहीं की है. मसलन, भाजपा की उस मांग पर वह दो वर्षों से चुप बैठा है, जिसमें राज्य इकाइयों में संगठन महामंत्री के रूप में 14 प्रचारकों को भेजने की बात थी. यह पद किसी राज्य इकाई की धुरी होता है, और इस पर बैठने वाला व्यक्ति पार्टी के भीतर आरएसएस का आदमी माना जाता है. नौ राज्यों में यह पद अब भी खाली है, जिनमें चुनावी राज्य उत्तराखंड भी शामिल है. भाजपा नेतृत्व समझता है कि लखनऊ में तीसरी बार जीतने के लिए उसे संघ के कार्यबल और नेतृत्व की भी जरूरत होगी. 6. टीम मोदी में फेरबदल य बह एकमात्र चुनौती है, जो पूरी तरह मोदी के नियंत्रण में है, इसलिए इस मामले में देरी का सबब ढूंढ़ा जा रहा है. जानकार कहते हैं कि मंत्रिपरिषद में सार्थक फेरबदल कुछ समय से लंबित है. 2024 के बाद विधानसभा चुनावों में लगातार जीत-हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली और बिहार से उम्मीद थी कि लोगों को बाहर करने, नए चेहरे लाने और यह साफ करने का मौका मिलेगा कि कौन किसके लिए जवाबदेह है. लेकिन वह मौका आया ही नहीं. नतीजतन, कुछ ऐसे मंत्री हैं जो वर्षों से उन्हीं मंत्रालयों में बैठे हैं, बिना इस गंभीर समीक्षा के कि उन्होंने क्या हासिल किया. प्रधान का नाम पहले भी फेरबदल की अटकलों में आया था, और उनके बने रहने की एक वजह शाह से उनकी नजदीकी बताई जाती थी. यह बात मददगार कतई नहीं है कि आखिरकार वे व्यापक पुनर्गठन के बजाए इस्तीफे के जरिए बाहर गए, क्योंकि इससे लगता है कि जनदबाव में वह बदलाव किया गया, जिसे प्रधानमंत्री अपनी शर्तों पर करना पसंद करते. पार्टी के सूत्र मोदी 3.0 के सबसे बड़े फेरबदल की उम्मीद कर रहे हैं, जो एक साथ दो संदेश देः कामकाज मायने रखता है, और युवा पीढ़ी जिम्मेदारी संभालने के लिए तैयार है. मोदी कैबिनेट में जमा हुआ यह बैकलॉग संगठन में भी दिखाई पड़ता है. पार्टी अध्यक्ष नितिन नबीन की राष्ट्रीय टीम का गठन महीनों से लंबित है. 45 वर्षीय राष्ट्रीय अध्यक्ष की नियुक्ति को पार्टी के भीतर युवा पीढ़ी को जिम्मेदारी सौंपने की शुरुआत के रूप में देखा गया था और नबीन निजी बातचीत में कह चुके हैं कि वे नए चेहरों और पुराने अनुभवी हाथों का 50:50 मेल चाहते हैं. यह अब तक नहीं हुआ. उत्तर प्रदेश में अब भी पूर्णकालिक प्रभारी नहीं है. पंजाब में भी कोई प्रभारी नहीं है. उत्तराखंड, जहां अगले साल चुनाव हैं, उन नौ राज्यों में से है जहां संगठन महामंत्री नहीं है. बताया जाता है कि राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड के राज्य नेतृत्वों की भी समीक्षा चल रही है. भाजपा ने उत्तराखंड में तीन बार मुख्यमंत्री बदले और फिर भी जीत हासिल की. एक-दो बदलाव यह संकेत देंगे कि जवाबदेही दिल्ली में आकर खत्म नहीं होती. नौकरशाही को फिर से संतुलित करना या उसमें फेरबदल करना ज्यादा कठिन काम है, जैसा कि मौजूदा शिक्षा संकट में साफ दिखता है. भाजपा और आरएसएस, दोनों के सूत्रों का कहना है कि यह सरकार अपने नौकरशाहों पर बहुत ज्यादा आश्रित है, कई मंत्रालयों में राजनैतिक नेतृत्व की भूमिका उन फैसलों पर मुहर लगाने तक सीमित हो गई है, जो पहले ही किए जा चुके होते हैं, और जब वे फैसले गलत साबित होते हैं तो संबंधित अधिकारियों को जवाबदेह नहीं ठहराया जाता. पिछले दशक में सेवारत और सेवानिवृत्त नौकरशाह संस्थागत ढांचे के बड़े हिस्से की कमान संभालने लगे हैं, चाहे वह रिजर्व बैंक में संजय मल्होत्रा हों, सेबी में तुहिन कांत पांडे, सितंबर से आइआरडीएआइ में अजय सेठ, भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग में रवनीत कौर या एनएसई में इंजेती श्रीनिवास. इस समीकरण को बदलने के मकसद से किए गए सुधार धीमे चले हैं. मिशन कर्मयोगी और लेटरल एंट्री की पहल वादे से काफी कम नतीजे दे पाई. शायद इन सबका नतीजा ही इस गर्मी में राजनैतिक विस्फोट था. मोदी ने बार-बार दिखाया है कि वे राजनैतिक झटकों को अवसरों में बदल सकते हैं. उन्हें अपने इस कौशल को एक बार फिर से आजमाना होगा. लेकिन सबसे पहले, उन्हें उस पीढ़ी का भरोसा फिर जीतना होगा, जो आगे चलकर देश के भविष्य को परिभाषित करेगी. - साथ में कौशिक डेका और एम.जी. अरुण

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