August 26, 2026
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सारसों की संरक्षक
जिस उम्र में ज्यादातर बच्चे कल्पना की दुनिया में खोए रहते हैं, नन्हीं पूर्णिमा देवी बर्मन को अपनी प्रेरणा एक ऐसे पक्षी में मिली जिससे सब डरते थे. हरगिला यानी ग्रेटर एडजुटेंट स्टॉर्क को अपशकुन माना जाता था. उसकी बेढंगी शक्ल और मरे जीवों को खाने की आदतों के कारण लोग उससे घृणा करते थे. वर्षों बाद एक फोन कॉल ने बचपन के उसी आकर्षण को जीवन का मिशन बना दिया. गांव वालों ने घोंसले वाला एक पेड़ इसलिए काट डाला था क्योंकि वे मानते थे कि ये परिंदे बुरा वक्त लेकर आते हैं. जब बर्मन गिरे हुए परिंदों को बचाने पहुंचीं तो उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा. कुछ समय पहले ही उनकी जुड़वां बेटियां पैदा हुई थीं. उन्होंने घायल चूजों में से एक को उठाया और तुरंत उससे जुड़ाव महसूस किया, उन्हें अपने बच्चों का ख्याल आया. उस क्षण उपजी सहानुभूति ने उन्हें कदम उठाने का हौसला दे दिया. बर्मन ने आगे चलकर हरगिला आर्मी बनाई, महिलाओं के नेतृत्व वाला जमीनी संरक्षण आंदोलन, जिसमें आज 2,000 से ज्यादा स्वयंसेविकाएं हैं. और वे घोंसलों की हिफाजत से बढ़कर काम करती हैं. उन्होंने ग्रेटर एडजुटेंट स्टार्क को डर और मजाक का पात्र माने जाने वाले पक्षी से
सबल, सफल और शक्ति स्वरुपा
जिस देश में महिलाओं की आबादी में हिस्सेदारी लगभग आधी है, वहां वे जल्द ही देश की सर्वोच्च विधायी संस्था संसद में एक-तिहाई राजनैतिक प्रतिनिधित्व पा सकती हैं. 2023 के नारी शक्ति वंदन अधिनियम के लागू होने से भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं का भरोसा और मजबूत हो सकता है. जैसे-जैसे ज्यादा युवतियां सत्ता और फैसले लेने वाली जगहों पर पहुंचेंगी, वे सिर्फ आज की राजनीति को नहीं, बल्कि कल के भारत को भी आकार देंगी. महिला सशक्तीकरण किस तरह बदलाव ला सकता है, यह देखने के लिए देश भर की बुनियादी संस्थाओं पर नजर डालनी होगी. फिलहाल भारत के पंचायती राज संस्थानों में करीब 14.5 लाख निर्वाचित महिला प्रतिनिधि हैं. यह कुल प्रतिनिधियों का 46 फीसद है, और स्थानीय शासन में महिलाओं की हिस्सेदारी के लिहाज से दुनिया में सबसे ज्यादा. बिहार के शादीपुर गांव की 36 साल की सरपंच डॉली को वह समय अच्छी तरह याद है जब उन्होंने स्थानीय विवाद सुलझाने के लिए ग्राम कचहरी संभाली थी. शुरुआत में लोग उनके पास से निकलकर उनके पति की तरफ चले जाते थे, उन्हें लगता था कि असली जिम्मेदारी उन्हीं के पास होगी क्योंकि भारत के ग्रामीण इलाकों में प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व आम हकीकत है. लेकिन डॉली ने अपने काम को बोलने दिया और जल्द ही किसी को शक नहीं रहा कि फैसले कौन ले रहा है. बिहार के ही एक और गांव, मुंगेर जिले के तिलकारी में बीना देवी ने पहले खुद आर्थिक आजादी की अहमियत समझी और फिर सौ से ज्यादा गांवों की महिलाओं तक इसे पहुंचाया. जब पास के कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक महिलाओं को मशरूम खेती की ट्रेनिंग देने आए तो उस समय तिलकारी की सरपंच रहीं बीना देवी ने इस हुनर को सिर्फ परिवार के लिए नहीं, बल्कि पूरे इलाके की महिलाओं के लिए उद्यम का इंजन बना दिया. कई बार सत्ता में मौजूद किसी महिला का दिखने में छोटा-सा हस्तक्षेप भी आसपास की महिलाओं की रोजमर्रा की जिंदगी बदल देता है. तेलंगाना में आइएएस अधिकारी हरिचांदना दसारी ने यही भूमिका निभाई. नारायणपेट की जिला कलेक्टर रहते हुए उन्होंने देखा कि स्थानीय महिलाओं ने साप्ताहिक बाजार जाना बंद कर दिया था क्योंकि वहां उनके लिए शौचालय की कोई सुविधा नहीं थी. हरिचांदना ने बाजार में शी-टॉयलेट बनवाया और स्थानीय लोग इसके लिए उनका जितना शुक्रिया अदा करें, कम है. डॉली, बीना और हरिचांदना उन 50 साल से कम उम्र की 50 महिलाओं में शामिल हैं, जिन्हें हम इस साल अपने स्वतंत्रता दिवस