July 22, 2026
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सेक्स और सहमति
हर दिन, लाखों भारतीय घरों में एक शांत-सा समझौता होता है. कोई महिला किसी मांग, किसी स्पर्श, किसी अपेक्षा को ना कहना चाहती है और मन ही मन उसके खामियाजे का अंदाजा लगाती है: इसे सीमा के रूप में लिया जाएगा या अपमान माना जाएगा? यह बात उसे समझानी पड़ेगी, नरमी से नकारना होगा या इसके लिए माफी मांगनी होगी? या फिर हामी भर देना ही आसान है? आखिर किसी महिला की ना की कोई अहमियत है? इस इकलौते सवाल के जवाब के मूल में है सहमति. यह सवाल अहम है, क्योंकि सहमति आजादी की सबसे छोटी इकाई है. संविधान, कार्यस्थल या वैवाहिक रिश्ते में बराबरी का दावा करने से पहले किसी महिला को बिना डर इनकार करने और बिना सजा के अपना मन बदलने में सक्षम होना चाहिए. भारत ने हाल के वर्षों में सहमति पर खूब बहस की है: वैवाहिक बलात्कार पर विचार करती अदालतों में, प्तमीटू के बाद न्यूजरूम में, फिल्मों, क्लासरूम और परिवार के व्हाट्सऐप ग्रुपों में. यह शब्द राष्ट्रीय शब्दावली में आ चुका है. लेकिन अब तक किसी ने यह नहीं मापा था कि क्या यह राष्ट्रीय विमर्श में भी शामिल हुआ है. इंडिया टुडे ग्रुप ने इसी का पता लगाने की कोशिश की है. देश में अपनी तरह के इस पहले सहमति सर्वे में हर क्षेत्र, आय वर्ग, शिक्षा स्तर, धर्म, रोजगार श्रेणी, वैवाहिक स्थिति और सामाजिक समूह की 5,000 वयस्क महिलाओं से पूछा गया कि वे सहमति के बारे में क्या सोचती हैं और जब वे उसे लागू करती हैं, तो वास्तव में क्या होता है. सर्वे के सवाल चार हिस्सों में रखे गए: सहमति, विकल्प और प्रेम की सीमाएं; परिवार, विवाह और नियंत्रण का निजी दायरा; सार्वजनिक, पेशेवर और डिजिटल उल्लंघनों से बनी असुरक्षित दुनिया; और शिक्षा, कानून तथा जवाबदेही के जरिए सहमति की संस्कृति बनाना. जवाब बताते हैं कि महिलाएं संगी, बड़ों, बॉस, अजनबी और स्क्रीन के सामने ना कहने जैसा काम कैसे करती हैं. पहले अच्छी खबर. लगभग पांच में से चार महिलाएं—सभी वर्ग, क्षेत्र और पीढ़ी की—मानती हैं कि हर परिस्थिति में, बिना किसी अपवाद के, नहीं का मतलब नहीं होता है. पर उनके पास जो नहीं है, वह है इसे अमल में ला पाने की सामाजिक अनुमति. केवल 36 फीसद के आसपास महिलाएं साफ कहती हैं कि दबाव में दी गई सहमति, सहमति नहीं होती. बाकी महिलाएं किसी न किसी रूप में दबाव में बनी सहमति को सहमति मानती हैं. अपना मन बदलने के अधिकार पर नमूना लगभग दो हिस्सों में बंट जाता है: 45 फीसद कहती हैं कि हां कहने के बाद बीच में सहमति वापस लेना स्वीकार्य है; 48 फीसद कहती हैं कि यह स्वीकार्य नहीं; सिर्फ 28 फीसद कहती हैं कि अंतरंग पलों के दौरान सहमति वापस लेने में कोई बुराई नहीं. ज्यादातर के मुताबिक ऐसी ्त्रिरयों को
चुप्पी तोड़ें और खुलकर बोल
अगर पहले तीन सेक्शन समस्या की पहचान को लेकर हैं तो चौथा आगे की राह की टोह लेता है. सवाल यह परखते हैं कि महिलाओं को शिक्षा, कानूनी सुरक्षा और संस्थागत मदद के तौर पर क्या मिला और वे अगली पीढ़ी के लिए क्या चाहती हैं. उनके जवाब सर्वे से निकली दो-टूक राय जाहिर करते हैं. आइए, पहले मौजूदा खामियों और कमियों पर नजर डालते हैं. सिर्फ 54 फीसदी को स्कूल या कॉलेज में रजामंदी और उसकी सीमा के बारे में कोई औपचारिक शिक्षा या वर्कशॉप मिली. बदतर हाल देखिए: 44 फीसदी की राय में उन्हें कभी यह नहीं सिखाया गया कि चुप रहने या विरोध न करने को रजामंदी माना जा सकता है. सिर्फ 55 फीसदी ने बचपन में गुड टच और बैड टच के बारे में जाना था. मतलब यह कि काफी बड़े हिस्से को शोषण पहचानने की बुनियादी जानकारी भी नहीं. कानून तो मौजूद हैं, लेकिन उस पर भरोसा कम है. सर्वे में दो-तिहाई को पॉश ऐक्ट (कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न की रोकथाम का कानून), सुप्रीम कोर्ट के विशाखा दिशा-निर्देश, हेल्पलाइन नंबर और जीरो एफआइआर जैसे प्रावधानों की जानकारी थी. फिर भी, सिर्फ 27 फीसदी ही पॉश कानूनी तंत्र को बहुत असरदार मानती हैं, जबकि 15 फीसदी को इसकी कोई जानकारी नहीं. दिल्ली में 2012 के निर्भया बलात्कार कांड के बाद हुए कानूनी सुधारों का नतीजा भी चिंताजनक है. सिर्फ 42 फीसदी का मानना है कि उन कड़े कानूनों के लागू होने के बाद महिलाओं की सुरक्षा में काफी या कुछ हद तक सुधार हुआ है, जबकि एक-तिहाई का कहना है कि कोई सुधार नहीं हुआ या स्थिति और खराब हो गई है. इसलिए सुझाव सिर्फ कानूनी इंतजामात तक सीमित नहीं. सवाल था: महिलाओं के खिलाफ अपराध कम करने का सबसे असरदार तरीका क्या है? जवाब में पुलिस व्यवस्था से ज्यादा अहमियत बच्चों की परवरिश पर था. 65 फीसदी ने माना कि बेटों को लड़कियों-्त्रिरयों का सम्मान करना सिखाया जाना चाहिए. 58 फीसदी की राय सख्त सजा के पक्ष में थी. इसी तरह, जब पूछा गया कि आपसी रजामंदी का माहौल बनाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी किसकी है? 58 फीसदी ने जिम्मेदारी परिवार की बताई, तो 54 फीसदी ने दारोमदार स्कूलों और कॉलेजों पर डाला, जो कानून और नीतियों से भी बढ़कर था. सबसे ज्यादा राय शिक्षा को लेकर है. 86 फीसदी चाहती हैं कि स्कूलों और कॉलेजों में रजामंदी के बारे में शिक्षा अनिवार्य हो, और उनमें सबसे ज्यादा (40 फीसदी) का कहना है कि यह शिक्षा 10 से 14 साल की उम्र के बीच शुरू होनी चाहिए. 85 फीसदी का कहना है कि वे खुद छोटी लड़कियों को सहमति और मना करने के अधिकार के बारे में सिखाएंगी. संदेश साफ है. जिन महिलाओं ने रजामंदी की समझ के बिना अपना जीवन बिताया, वे चाहती हैं कि अगली पीढ़ी के साथ ऐसा न हो.