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February 25, 2026

सबसे व्यापार

जट्रंप को फोन किया, तो यह शायद उनकी सबसे अहम विदेश और आर्थिक नीति से जुड़ी बातचीत थी. यह बेहद सोच-समझकर तैयार की गई रणनीति का आखिरी कदम था, जो कुछ वैसा ही बड़ा आर्थिक दांव था जैसा 1991 में प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव और वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने आर्थिक सुधारों के जरिए खेला था. पिछले कई महीनों से मोदी इसका रास्ता तैयार कर रहे थे, ताकि आजादी के बाद देश की सबसे बड़ी वैश्विक व्यापार पहल को अंजाम दिया जा सके. इसका नतीजा यह होना था कि भारत उन देशों के साथ व्यापार करार पर दस्तखत करे जिनकी कुल जीडीपी 600 खरब डॉलर (5,440 लाख करोड़ रु.) है, यानी दुनिया की करीब आधी अर्थव्यवस्था. ये बड़े समझौते एक नई व्यापार सोच को साफ करते हैं. अब भारत खुलापन और संरक्षणवाद के बीच झूल नहीं रहा. वह साफ तौर पर दुनिया की सबसे मजबूत और सख्त अर्थव्यवस्थाओं के साथ मुकाबले और साझेदारी के लिए खुद को तैयार कर रहा है. दशकों तक बड़ा घरेलू बाजार होने की वजह से भारतीय उद्योग भीतर ही भीतर सुरक्षित और सहज बना रहा. लेकिन अब, जैसा एक विशेषज्ञ

दूसरी चिंताए

अनिश्चितता कृषि को लेकर भारी है. भारत के कृषि बाजार को खोलने की राजनीति बेहद संवेदनशील है. मोदी सरकार कह चुकी है कि अनाज और दूसरे संवेदनशील कृषि क्षेत्र किसी भी समझौते से बाहर हैं. लेकिन कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरिम दस्तावेज में यह नहीं बताया गया है कि किन चीजों को बाहर रखा गया है. अमेरिका के साथ हुए अंतरिम समझौते की पूरी जानकारी शायद मार्च के मध्य तक ही सामने आएगी. इन दोनों समझौतों में भारत के सामने और भी जोखिम हैं. आज का वैश्विक व्यापार सिर्फ टैरिफ तक सीमित नहीं है. असली चुनौती मानक, सर्टिफिकेशन, प्रोडक्ट क्वालिटी, जलवायु से जुड़े नियम और कंपनियों की क्षमता है कि वे लागत, नियमों के पालन और रफ्तार के मामले में कितना टिक पाती हैं. खासकर छोटी और मझोली कंपनियों के लिए यह आसान नहीं है. व्यापार विशेषज्ञ बिस्वजीत धर कहते हैं, दुर्भाग्य से कई नीति-निर्माता अब भी यह नहीं समझते कि टैरिफ से आगे भी दुनिया है, जहां विकसित देशों ने कई तरह की रुकावटें खड़ी कर दी हैं. यूरोप ने कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (सीबीएमएम) लागू किया है और पर्यावरण तथा स्वास्थ्य मानकों पर सख्ती से अमल कराता है. हम अपने निर्यातकों को इन कड़े मानकों के लिए ठीक से तैयार ही नहीं करते. भारत ऐसे जटिल समझौते कर ले और उन पर अमल की क्षमता न बना पाए, तो पहले जैसा एफटीए विरोध फिर सामने आ सकता है. आयात बढ़ सकते हैं, निर्यात सीमित रह सकता है और फिर राजनैतिक स्तर पर उन्हें अनुचित समझौते कहकर घेरा जा सकता है. कई भारतीय कंपनियां घरेलू बाजार पर ही निर्भर रहीं और वैश्विक मानकों के हिसाब से खुद को उतना तैयार नहीं किया. धर कहते हैं, औद्योगिक उन्नयन की जो सोच होती है—जैसे सही सेक्टर चुनना, प्रदर्शन के आधार पर दबाव बनाना या बड़े पैमाने पर उत्पादन की मांग करना—उसे भारत में शायद ही कभी अनुशासन के साथ लागू किया गया. अब यह करना ही होगा. इसके साथ ही केंद्र और राज्य सरकारों को कारोबार करना आसान बनाना होगा, चाहे लॉजिस्टिक की लागत कम करना हो, जरूरी कच्चे माल पर ड्यूटी घटानी हो या नियमों की भीड़ को कम करना हो—इन सब पर ठोस कदम उठाने होंगे. एक और बड़ी कमजोरी है नवाचार. धर का कहना है कि कोई भी मैन्युफैक्चरिंग महाशक्ति लगातार आरऐंडडी, नई टेक्नोलॉजी और उत्पादकता में निवेश किए बिना नहीं बन सकती. भारत में आरऐंडडी पर कुल खर्च जीडीपी का 0.6 फीसद है, जबकि चीन में 2.5 फीसद और अमेरिका में 4 फीसद है. खुलने का मतलब सिर्फ विदेशी करार नहीं है, बल्कि देश में अमल करना भी है. मौका ऐतिहासिक है. अगर मैन्युफैक्चरिंग, निर्यात और वैश्विक वैल्यू चेन में जुड़ाव मजबूत हो, तो इसका असर 1991 के आर्थिक सुधारों जितना बड़ा हो सकता है. हैं. अमेरिकी करार के पूरे द्ब्रयौरे अभी नहीं आए हैं, लेकिन यह व्यापार उदारीकरण की दिशा में पहल का संकेत है. फिर भी, अमेरिकी करार विवाद लेकर आया है. सबसे बड़ा सवाल उस कथित इरादे को लेकर है कि भारत अगले पांच साल में अमेरिका से 500 अरब डॉलर (45.3 लाख करोड़ रु.) का सामान खरीदेगा, जबकि अभी अमेरिका से आयात करीब 46 अरब डॉलर (4.2 लाख करोड़ रु.) का है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने लोकसभा में कहा कि इस लक्ष्य के लिए भारत को अमेरिका से आयात तीन गुना करना पड़ेगा और उन्होंने मोदी सरकार पर अमेरिका के आगे सरेंडर करने का आरोप लगाया. लेकिन गोयल इस आंकड़े को सोचा-समझा और व्यावहारिक बताते हैं. वे कहते हैं, हमने बहुत सोच-समझकर विश्लेषण किया है. आज भी हम ऐसे ही उत्पाद दुनिया भर से करीब 300 अरब डॉलर (27.2 लाख करोड़ रु.) के आयात करते हैं और हमारी जरूरत तेजी से बढ़ रही है. वे बताते हैं कि भारत को ऊर्जा उत्पाद, आइसीटी हार्डवेयर, हाइ-टेक सेमीकंडक्टर चिप, कोयला, विमान और कीमती धातुओं की बड़ी मात्रा में जरूरत है. वे कहते हैं, अगले पांच साल में हमें ऐसे उत्पादों के करीब 20 खरब डॉलर (181.3 लाख करोड़ रु.) के आयात की जरूरत पड़ेगी.

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