August 19, 2026
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अंडे पर खींचतान
स्कूली बच्चों की दोपहर की थाली में अंडा देश के सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने की दरारों को जितनी स्पष्टता से पेश करता है, वैसा शायद ही कोई व्यंजन कर सके. इसी वजह से पश्चिम बंगाल का ताजा मिड-डे मील विवाद मेन्यू में बदलाव से कहीं ज्यादा राजनैतिक बवंडर बन गया. राज्य में नौ मई को पहली बार भाजपा की सरकार बनने के फौरन बाद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने घोषणा की कि कोलकाता नगर निगम (केएमसी) क्षेत्र के करीब 1,800 सरकारी और सरकार से सहायता प्राप्त स्कूलों के लिए पका हुआ मिड-डे मील अन्नामृत फाउंडेशन तैयार करेगा. यह इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शसनेस (इस्कॉन) का एक एनजीओ है. यह संगठन सख्त शाकाहारी परंपरा का पालन करता है. इसका मतलब यह था कि इन स्कूलों के मिड-डे मील की थाली में जल्द ही अंडों की जगह सोया, पनीर, राजमा और दालें परोसी जाने लगेंगी. किसी और राज्य में इस तरह का कदम उठाया गया होता तो शायद लोगों के ध्यान में भी नहीं आता. लेकिन बंगाल में मछली, मांस और अंडे ज्यादातर लोगों के रोजमर्रा के खानपान का हिस्सा हैं. ऐसे में विपक्षी दलों ने नई भाजपा सरकार पर पिछले दरवाजे से शाकाहार थोपने का आरोप लगाया. अभिभावकों ने साफ कहा कि सरकारी स्कूलों में बच्चे क्या खाएंगे, यह किसी धार्मिक संगठन की भोजन संहिता से क्यों तय हो? शिक्षकों ने सावधान किया कि अंडे थाली की एक और चीज भर नहीं, बल्कि गरीब परिवारों के कुछ बच्चों के लिए स्कूल आने की एक वजह भी हैं. भारी विरोध ने सरकार को पीछे हटने पर मजबूर किया. 29 जुलाई को शुभेदु अधिकारी ने ऐलान किया कि पहली अगस्त से इस्कॉन पायलट प्रोजेक्ट के तहत शाकाहारी भोजन देगा लेकिन स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) अलग से अंडे उपलब्ध कराएंगे. उन 185 केएमसी संचालित स्कूलों में भी अंडे फिर शुरू किए जाएंगे, जहां तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) शासन के समय से इस्कॉन पहले ही शाकाहारी भोजन दे रहा था. अधिकारी ने ओडिशा मॉडल का हवाला देते हुए कहा, "इनके साथ-साथ राज्य सरकार एसएचजी के जरिए छात्रों को प्रोटीन के लिए अंडे देगी." इस तरह से बंगाल के मिड-डे मील में अंडा वापस आ गया है. लेकिन इस विवाद ने देश के मौजूदा तानेबाने की जैसे सीवन उधेड़ दी किः आखिर क्यों कुछ राज्यों के स्कूलों में छात्रों को अंडे मिलें और दूसरों को नहीं? बच्चों को किफायती प्रोटीन उपलब्ध कराने का मामला क्या राज्य की राजनीति, स्थानीय खानपान की आदतों, धार्मिक भावना, लागत खर्च, लॉजिस्टिक्स या केंद्रीकृत शाकाहारी भोजन सप्लायरों की पसंद पर निर्भर होना चाहिए? देश में अब भी बच्चों का कुपोषण एक बड़ी समस्या है, ऐसे में क्या सियासत को बच्चों की सेहत के मामलों पर हावी होने दिया जाना चाहिए? राष्ट्रीय दरार अ परान्ह भोजन या मिड डे मील कार्यक्रम करीब 10.4 लाख स्कूलों में लगभग 11.2 करोड़ बच्चों को मुहैया कराया जाता है, जिसे अब प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण या संक्षेप में पीएम पोषण कहा जाता है. इस तरह से यह दुनिया का सबसे बड़ा स्कूली बच्चों का भोजन कार्यक्रम बन गया है. यह सीधे-सादे वादे पर खड़ा किया गया था कि गरम पका हुआ भोजन बच्चों को स्कूल में खींचेगा, हाजिरी सुधरेगी और यह उन्हें पर्याप्त पोषण मुहैया कराने का बुनियादी आधार बनेगा. लेकिन यह आधार बराबर नहीं. केंद्र कैलोरी और प्रोटीन के मानक तय करता है, मुफ्त में अनाज देता है और रसोई खर्च राज्यों के साथ साझा करता है. लेकिन मेन्यू राज्य सरकारें तय करती हैं. नतीजा पोषण का एक अजीब भूगोल है (देखें: अंडे पर भारी मतभेद). एक राज्य में बच्चे को हफ्ते में छह दिन अंडे मिल सकते हैं. दूसरे में कभी नहीं. तीसरे में अंडे कागज पर हो सकते हैं लेकिन वे स्थानीय फंड, माता-पिता की सहमति, सप्लायरों या स्कूल मैनेजमेंट कमेटी की दान जुटाने की इच्छा पर निर्भर करते हैं. राज्यों से मिले इनपुट के आधार पर मौजूदा गिनती साफ तस्वीर पेश करती है: 28 राज्यों में से सिर्फ 16 और आठ केंद्र शासित प्रदेशों में से चार नियमित पीएम पोषण या राज्य-पोषित पूरक स्कूल भोजन मेन्यू में अंडे शामिल करते हैं. सोलह ऐसा नहीं करते. अंडे परोसने वाले राज्य मुख्य रूप से दक्षिण, पूर्व और पूर्वोत्तर के कुछ हिस्सों में केंद्रित हैं: आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, ओडिशा, बिहार, झारखंड, उत्तराखंड, असम, त्रिपुरा और कुछ अन्य राज्य अपने-अपने ढंग से कम ज्यादा अंडे परोसते हैं. गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, महाराष्ट्र, गोवा और दिल्ली समेत कई राज्य अंडा-मुक्त या बड़े पैमाने पर शाकाहारी सूची में हैं. यही अंडों की बड़ी खाई है. इसे सिर्फ दलगत राजनीति से परिभाषित नहीं किया जा सकता. हालांकि राजनीति उससे दूर भी कहां रहती है. भाजपा शासित कर्नाटक ने धार्मिक समूहों के विरोध के बावजूद बसवराज बोम्मई के कार्यकाल में 2021-22 में अंडे परोसने शुरू किए, एनडीए-शासित आंध्र प्रदेश अब भी हफ्ते में पांच दिन अंडे परोसता है. भाजपा शासित उत्तराखंड हफ्ते में एक बार अंडे या फल परोसता है, और हफ्ते में दो बार स्किम्ड मिल्क, फिर भी उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में भाजपा शासित या भाजपा-प्रभावित राजनैतिक व्यवस्था ने शाकाहारी भोजन को तरजीह दी है या अंडों के लिए राज्य फंडिंग वापस ले ली है. कांग्रेस या विपक्ष-शासित राज्य भी
सीजेपी का अगला कार्यक्रम
क्या बोलती पब्लिक?" दो दिनों की चर्चा के बाद कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के सदस्यों ने यह सवाल सड़कों पर ले जाने का फैसला किया है. वे देश भर में फैलकर जमीनी स्तर पर लोगों की बात सुनेंगे कि वे क्या चाहते हैं. लेकिन संभाजीनगर में पार्टी संयोजक अभिजीत दीपके के घर पर हुए कॉकरोच कॉन्क्लेव से शायद जो ज्यादा अहम संदेश निकला, वह महत्वाकांक्षा का है. सितंबर में अगले अभियान की अगुआई करने वाले लोग विरोध में जुटे इंस्टाग्रामर्स का बिखरा हुआ समूह नहीं रहेंगे. वे ऐसे संगठन का प्रतिनिधित्व करेंगे, जिसका ढांचा नाम को छोड़ दें तो कैडर-आधारित राजनैतिक पार्टी जैसा दिखता है. पार्टी ने अपना ढांचा औपचारिक कर दिया है. दीपके इसके संस्थापक और राष्ट्रीय संयोजक हैं जबकि दिल्ली के सौरभ दास और जयपुर के आशुतोष रांका- जो दिल्ली प्रदर्शनों के दो अन्य सबसे पहचाने जाने वाले चेहरे हैं-सह-संयोजक होंगे. इसके आगे एक क्रमबद्ध संगठन होगा, जिसमें लीगल अफेयर्स, पॉलिसी, टेक, फाइनेंस आदि जैसे साफ तय वर्टिकल होंगे और हर वर्टिकल की अपनी बैकरूम टीमें होंगी. महाराष्ट्र में आम आदमी पार्टी के युवा विंग से जुड़े रहे और दीपके के लंबे समय से सहयोगी अजिंक्य शिंदे एक राजनैतिक स्टार्ट-अप के सीओओ जैसे होंगे, जो पूरे ढांचे को संभालेंगे. शीर्ष चार के अलावा दीपक बालियान भी हैं, जो राजस्थान में किसान मुद्दों के एक्टिविस्ट हैं और जिन्हें रांका इस संगठन में लाए, लीगल अफेयर्स टीम की प्रमुख दिल्ली की वकील और पूर्व पत्रकार रत्ना सिंह हैं. उनकी टीम आंदोलन का काम करते हुए कानून से टकराव में आने वाले किसी भी व्यक्ति को कानूनी मदद देगी. (देखें: सीजेपी में किसकी क्या है जिम्मेदारी) सिर्फ ढांचे के स्तर पर देखें तो सीजेपी ने अपने लिए जो स्वरूप तय किया है, वह एक पार्टी के ढांचे जैसा दिखता है- जोनल इंचार्ज, राज्य और लोकसभा क्षेत्र इकाइयां और आदेश की एक समर्पित श्रृंखला. ढीले-ढाले आंदोलनों का व्यवहार आम तौर पर ऐसा नहीं होता. वे अभी चुनाव लड़ते हैं या बाद में, यह पूरी तरह उनका अपना फैसला है. अगर विरोध ही आपका अंतिम लक्ष्य हो तो आप जोनल कमान और अनुशासित कैडर नहीं बनाते. सीजेपी की मन की बात अ पने दोनों सह-संयोजकों के साथ खड़े दीपके ने बैठक के बाद कहा, "भारत की करीब 65 फीसद आबादी 35 वर्ष से कम उम्र की है, लेकिन शिक्षा और बेरोजगारी जैसे क्षेत्रों में उन्हें जिन समस्याओं का सामना