October 14, 2026
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साख पर संकट
कई महीनों से चुनाव आयोग विपक्ष के "वोट चोरी" के आरोपों से जूझता आ रहा है. वह इन दावों को भी खारिज करता रहा है कि मतदाता सूचियों के उसके विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) ने कमजोर तबकों के नागरिकों पर असंवैधानिक बोझ डाला. लेकिन 23 सितंबर को इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक रिपोर्ट उसकी साख को लेकर चल रहे संघर्ष को निर्वाचन सदन के भीतर ले आई. खबर के मुताबिक, तीन चुनाव आयुक्तों में से दो-सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों के दौरान कम-से-कम 14 बार ऐसे फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज की जो उनके मुताबिक, उन्हें बताए बिना लिए या जारी किए गए थे. उन्होंने यह भी पूछा कि इन्हें मंजूरी किसने दी थी. चुनाव आयोग ने अपनी ओर से दो प्रेस नोट जारी करके कहा कि एसआइआर से जुड़े सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे, हालांकि उसने खबर में लगाए गए कुछ दूसरे आरोपों का जवाब नहीं दिया. यह विवाद अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. शीर्ष अदालत ने 29 सितंबर को उस याचिका पर अगले हफ्तों में सुनवाई के लिए हामी भरी, जिसमें सवाल उठाया गया है कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार ने बाकी दो चुनाव आयुक्तों (ईसी) की सहमति के बिना अहम फैसले लिए, याचिका में अक्तूबर 2025 से अब तक के चुनाव आयोग के रिकॉर्ड पेश करने और सुरक्षित रखने की मांग की गई है. इससे आयोग के भीतर फैसले लेने की प्रक्रिया और सर्वसम्मति के उसके
और अब उभरे नगाओं के जख्म
सितंबर के अंत तक मणिपुर में डर और हिंसा के तीन वर्ष पुराने दौर में एक नया आयाम जुड़ गया. 26 सितंबर को सेनापति जिले के कालेनजांग में दो नगा लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी गई जबकि दो अन्य घायल हो गए, महज सितंबर महीने में ही यह इस तरह की छठी घटना थी. कुकी-नगा झड़पों में मरने वालों की संख्या लगातार बढ़ती आई है. लेकिन सितंबर खासा घातक साबित हुआ जिसमें 14 लोगों ने जान गंवाई. 4 फरवरी को युमनाम खेमचंद सिंह के नेतृत्व में भाजपा सरकार बनने के बाद से कुल मौतों का आंकड़ा 40 से ज्यादा हो चुका है, और सितंबर मध्य तक 100 से ज्यादा घर आग के हवाले किए जा चुके थे. फरवरी में नगाओं और कुकी-जो समुदाय के बीच तल्खी की जो दरार बनी थी, वह अब और चौड़ी हो चुकी है. यह इस बात का साफ संकेत है कि संघर्ष कैसे और फैलते हुए नए पक्षों को भी इसमें शामिल करता जा रहा है. तीन साल पहले जब 3 मई, 2023 को मणिपुर में हिंसा भड़की, तब मुख्य संघर्ष मैतेई-बहुल इंफाल घाटी और कुकी-जो की बहुसंख्यक आबादी चुड़ाचांदपुर तथा कांगपोकपी के पहाड़ी इलाकों के बीच ही केंद्रित था. सेनापति, उखरुल, तमेंगलांग, कामजोंग और नोनी जैसे जिलों में रहने वाले नगा काफी हद तक उससे दूर ही रहे. दरअसल, नगा इलाके में कुछ ऐसे रास्ते बने थे, जहां से विभिन्न समुदायों के लोग जातीय संघर्ष की चपेट में आने की आशंका के बिना आ-जा सकते थे. लेकिन अब वह तटस्थता का दौर बीती बात हो चुका. एक नई दरार करीब साल भर तक राष्ट्रपति शासन के बाद खेमचंद सत्ता में आए और उनके पद संभालने के महज तीन दिन बाद 7 फरवरी को उखरुल जिले के लिटन सरेइखोंग में कुकी-जो पुरुषों और एक तंगखुल नगा व्यक्ति के बीच कहासुनी एकाएक आक्रामक हो गई. थोड़ी ही देर में विवाद हिंसक हो गया और पथराव, आगजनी के साथ गोलीबारी भी हुई. दोनों समुदायों के घरों में आग लगाई गई और लोग साझा आबादी वाली बस्तियां छोड़कर भागने लगे. वैसे तनाव लिटन के वाकए से पहले से ही पनप रहा था. जनवरी में टाइगर जर्मन रोड को लेकर कांगपोकपी में विवाद बढ़ गया था. यह रास्ता कुकी-जो समूहों ने मैतेई-बहुल घाटी से गुजरे बिना कांगपोकपी को सीधे चुड़ाचांदपुर से जोड़ने के लिए बनाया था. मार्ग का कुछ हिस्सा नगा गांवों के दावे वाले क्षेत्रों से होकर गुरता है, जिनका कहना है कि यह सड़क उनकी पैतृक भूमि का अतिक्रमण