January 14, 2026
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मोदी युग का आगाज
भारतीय राजनीति के इस कालखंड में एक ऐसे नेता का उभार दिखा, जिसने निजी विवादों को राजनैतिक पूंजी में तद्ब्रदील कर डाला और क्षेत्रीय पकड़ को राष्ट्रीय जनादेश में बदल दिया. नरेंद्र मोदी का यह सफर न अचानक था, न संयोग. इसके पीछे थी गुजरात में बार-बार मिली चुनावी जीत, अपनी इमेज और नैरेटिव को लगातार गढ़ने की कोशिश, और केंद्र में फैली अनिर्णय, भ्रष्टाचार और लचर स्थिति से जनता की नाराजगी. मोदी 2000 के दशक के मध्य तक हद दर्जे का ध्रुवीकरण करने वाले मुख्यमंत्री थे. 2002 के गुजरात दंगों की छाया उनके साथ जुड़ी हुई थी. राष्ट्रीय स्तर पर राजनीति का एक हिस्सा, बुद्धिजीवी वर्ग और यहां तक कि भाजपा के कुछ सहयोगी भी उन्हें संदेह की नजर से देखते थे. लेकिन उन्होंने पहचान की राजनीति से बहस को हटाकर आकांक्षा की तरफ मोड़ दिया. गुजरात मोदी की राजनैतिक प्रयोगशाला बना. 2007 और 2012 के विधानसभा चुनाव सिर्फ जीत नहीं थे, बल्कि उस सोच पर मुहर थे जिसे बाद में गुजरात मॉडल कहा गया. तेज आर्थिक विकास, उद्योग सम्मेलनों, बिना रुकावट बिजली और निवेश को खुला न्योता देने की नीति ने शासन को विचारधारा की शक्ल दे दी. इन्हीं चुनावों में मोदी ने राजनैतिक संवाद पर अपनी पकड़ भी साबित की. 2010 के दशक के शुरुआती वर्षों तक मोदी का असर गुजरात से बाहर निकल चुका था. केंद्र में यूपीए सरकार घोटालों, नीतिगत जड़ता और आर्थिक सुस्ती में फंसी हुई थी. ऐसे में मोदी ने खुद को अनिर्णय के ठीक उलट विकल्प के तौर पर पेश किया. 2014 का उनके जैसा चुनाव अभियान भारत ने पहले कभी नहीं देखा था. इसमें राष्ट्रपति शैली की पेशकश थी, जमीनी स्तर की भीड़ जुटाने की ताकत थी, सोशल मीडिया और विशाल रैलियों का मेल था. अबकी बार, मोदी सरकार सिर्फ नारा नहीं था. यह उस राजनैतिक केंद्रीकरण का ऐलान था, जो लंबे समय से गठबंधनों और समझौतों के आदी हो चुके सिस्टम को बदलने जा रहा था. मई 2014 में मिली उनकी भारी जीत ऐतिहासिक थी. भाजपा को मिला अकेले दम पर बहुमत 1989 के बाद से चली आ रही इस धारणा को तोड़ गया कि गठबंधन अपरिहार्य है. मोदी का उभार झिझक भरे नेतृत्व के दौर का अंत और भारतीय लोकतंत्र में ज्यादा केंद्रीकृत, व्यक्ति आधारित राजनीति की शुरुआत था. इसका असर जीत का जश्न खत्म होने के बाद भी लंबे वक्त तक देश की दिशा तय करता रहा
जब लोकतंत्र को ही कर लिया गया कैद
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के 21 महीने के संसदेत्तर शासन को लंबे समय से इमरजेंसी के काले दिन कहा जाता रहा है. सरकारी भाषा हो या पत्रकारिता, दोनों में यह जुमला लगभग ऐसा ही है. पिछले साल उस बदनाम दौर को सरकारी तौर पर एक सालगिरह भी मिली, जब गृह मंत्री अमित शाह ने ऐलान किया कि 25 जून को अब संविधान हत्या दिवस के तौर पर मनाया जाएगा. इसी साल उसकी पचासवीं बरसी पर बॉलीवुड की चर्चित अभिनेत्री कंगना रनौत ने एक राजनैतिक मेलोड्रामा फिल्म इमरजेंसी भी बनाई. लेकिन पीछे मुड़कर देखें तो लगता है कि भारतीय राजनीति के उस अध्याय को जरूरत से ज्यादा नाटकीय ढंग से पेश किया गया और ठीक से जांचा-परखा भी नहीं गया है. जाहिरा वजहों से इमरजेंसी को अक्सर तानाशाही या यहां तक कि फासीवाद कहा जाता है. लेकिन उस दौर के वैश्विक हालात से तुलना करें तो इंदिरा गांधी एक तरह से नरम तानाशाह ही थीं. 1970 का दशक पिनोशे, पोलपोट और ईदी अमीन जैसे क्रूर सैन्य शासकों का दौर था. उसी समय सद्दाम हुसैन और मुअम्मर गद्दाफी भी थे. थोड़ा नजदीक देखना चाहें तो जनरल जिया और सुहार्तो जैसे शासक मौजूद थे. इमरजेंसी के बाद का दौर भी उतना नाटकीय नहीं रहा. जनता पार्टी की गठबंधन सरकार भारी चुनावी उत्साह के साथ आई, लेकिन सिर्फ 29 महीनों में अंदरूनी झगड़ों में बिखर गई. यह अवधि खुद इमरजेंसी से बस थोड़ी ही लंबी थी. उसके बाद इंदिरा गांधी और कांग्रेस की वापसी हुई, मानो भारत अपनी पुरानी डिफॉल्ट राजनीति, यानी वंश और एक पार्टी के शासन, पर लौट आया हो. लेकिन असल में भारत की राजनीति के ढांचे में गहरे तौर पर बहुत कुछ बदल चुका था. इस टूट की अनुगूंज अब भी सुनी जा सकती है और उसका असर हमारी राजनैतिक व्यवस्था को आज भी आकार दे रहा है. इमरजेंसी के तुरंत बाद एक नए दौर की शुरुआत हुई, जिसमें गठबंधन राजनीति को जगह मिली. इससे नए तरह के नेताओं और राजनैतिक दलों को पहली बार सत्ता का स्वाद मिला. और खुद इमरजेंसी एक बड़ा सबक थी. उसने दिखा दिया कि केंद्र में बैठा कोई करिश्माई नेता किस तरह न्यायपालिका, मीडिया और पूरे नागरिक समाज को डराकर खामोश सहमति के लिए मजबूर कर सकता है.