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April 29, 2026

इस बार महा मुकाबला

दो परस्पर विरोधी नेता एक ही राह पर आगे बढ़ रहे थे हालांकि एकदम उल्टी दिशा में. ये थे तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की नेता, पश्चिम बंगाल की मौजूदा मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और कभी उनके बेहद करीबी रहे लेकिन अब बंगाल भाजपा का चेहरा शुभेंदु अधिकारी. दोनों भवानीपुर की ओर जा रहे थे (शुभेंदु 2 अप्रैल को और ममता छह दिन बाद).यह वही चुनावी अखाड़ा है जहां 29 अप्रैल को इन दोनों के बीच सीधा मुकाबला है. ममता के इस शिष्य ने पहले भी अपनी काबिलियत साबित की है; 2021 में उन्होंने अपनी गुरु से नंदीग्राम छीन लिया था, और इस बार ममता के उनके ही गढ़ में फिर वही कमाल दोहराने की कोशिश में हैं. उधर, ममता खुद को न सिर्फ बंगाली अस्मिता की रक्षक के तौर पर पेश कर रहीं, बल्कि खुद को पीड़ित और ऐसी इकलौती योद्धा साबित करने में जुटी हैं जो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की केंद्र सरकार की साझा ताकत का अकेले ही सामना कर रही हैं. वे रैली दर रैली में दोहराती हैं, कुल 19 राज्यों और केंद्र सरकार ने मेरे खिलाफ मोर्चा खोल रखा है...लेकिन मैं आम लोगों के लिए लड़ाई जारी रखूंगी. शुभेंदु के दो अप्रैल को सर्वे बिल्डिंग (वही जिला चुनाव कार्यालय जहां उन्होंने अपना पर्चा भरा था) तक निकाले गए जुलूस ने ममता की बात को ही सही साबित किया. वह किसी चलते-फिरते तमाशे से कम नहीं था, जिसमें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, शुभेंदु और बंगाल भाजपा अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने सजे-धजे वाहन पर 1.7 किलोमीटर का सफर तय किया. इस दौरान रास्ते में सांस्कृतिक कार्यक्रम भी चल रहे थे. भीड़ सिर्फ स्थानीय लोगों की नहीं थी; बल्कि पूर्वी मेदिनीपुर, हावड़ा और घटाल जिलों तक से समर्थक जुटाए गए थे. इसके उलट, ममता 8 अप्रैल को अपने घर से बाहर निकलीं—जो सर्वे बिल्डिंग से लगभग एक किलोमीटर दूर है—और पैदल ही वह दूरी तय की. उनके साथ कोई तामझाम न था, बस कुछ करीबी सहयोगी थे. वहां जुटी भीड़ छोटी लेकिन पूरी तरह स्थानीय लोगों की थी. ब्रांड ममता को गढ़ना म मता इस चुनाव को सिर्फ सत्ता में वापसी के लिए ही नहीं, बल्कि कड़ी चुनौतियों के बीच अपने राजनैतिक वजूद को बचाने की लड़ाई के तौर पर पेश कर रही हैं, ठीक जैसे संकट में घिरा कोई भी शासक अपने राज्य की रक्षा करता है. उन्होंने बंगाल में भाजपा की बढ़त पहले भी रोकी है, 2021 के विधानसभा चुनाव में भी—जब तृणमूल ने बंगाल की 294 सीटों में से 215 पर जीत हासिल की थी—और 2024 के आम चुनाव में भी—जिसमें उन्होंने भाजपा को 2019 में मिलीं कुल 42 में से 18 सीटों की संख्या को घटाकर 12 कर दिया था. इस बार अगर वे यही कमाल फिर दोहरा पाती हैं तो शीला दीक्षित को पीछे छोड़कर देश की सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाली पहली महिला बन जाएंगी. साथ ही, इससे 2029 के आम चुनाव से पहले उनके देश की सबसे सशक्त विपक्षी नेता बनने का रास्ता भी साफ हो जाएगा. लेकिन सबसे पहले उन्हें सत्ता-विरोधी लहर, भर्ती घोटालों को लेकर लोगों की नाराजगी और (खासकर 2024 में आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में मेडिकल छात्रा अभया के साथ दुष्कर्म और हत्या की घटना के मद्देनजर) महिला सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं पर काबू पाना होगा और साथ ही बेरोजगारी, आम सुविधाओं की कमी और औद्योगिक विकास के अभाव जैसी पुरानी समस्याओं से भी निबटना होगा. बहरहाल, उनकी रैलियों में भारी भीड़ उमड़ती है, खासकर ग्रामीण बंगाल में, जहां ममता का हेलिकॉप्टर देखते ही लोगों में उत्साह की लहर दौड़ जाती है. उनके लिए वे आज भी दीदी हैं, जो उनके कल्याण के लिए काम करेंगी और उनके अधिकारों के लिए लड़ेंगी. ममता ने हमेशा चुनावी मुकाबले को बंगाल की पहचान बचाने की लड़ाई के तौर पर पेश किया है और खुद को बंगाली पहचान का प्रतीक बताती रही हैं. उनका आरोप है कि बाहरी पार्टी भाजपा इसी पहचान को बदलने की साजिश रच रही है. तृणमूल का दावा है कि यह उत्तर भारतीय हिंदुत्ववादी पार्टी, माछ-भात खाने वाले बंगालियों की खान-पान संस्कृति को भी नहीं बख्शेगी, अगर यह पार्टी सत्ता में आ गई तो बहुत संभव है कि बंगालियों पर शाकाहार थोप दे. इससे इतर, ममता एक अधिक समावेशी नारा भी देती हैं, जे लड़छे सोबार डाके, से जिताबे बांग्ला मां के. यानी सबके लिए लड़ने वाला ही बंगाल मातृभूमि को जीत दिलाएगा. तृणमूल की नेता खुद के सताए होने के नैरेटिव को कई अन्य मुद्दों के सहारे और धार दे रही हैं—जैसे मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर), चुनाव से पहले पुलिस अधिकारियों का तबादला, और चुनाव के बीच परिसीमन विधेयक लाने की कोशिश. ममता का आरोप है कि परिसीमन विधेयक भाजपा की अगुआई वाली केंद्र सरकार की बड़ी साजिश है जिसका मकसद मोटे तौर पर राज्य को बांटना है—या तो उसे तीन हिस्सों में बांटकर, या उसके

भाजपा के सम्राट, नीतीश का आशीर्वाद

जगह थी बिहार भाजपा का दफ्तर. मौका था बिहार में पार्टी के पहले सीएम के स्वागत समारोह का. इस दिन का इंतजार बिहार भाजपा के नेताओं ने दिवंगत कैलाशपति मिश्र के जमाने से लेकर अब तक किया था. मगर लोकभवन में पद और गोपनीयता की शपथ लेकर बुधवार, 15 अप्रैल की दोपहर जब सम्राट चौधरी पार्टी दफ्तर पहुंचे तो उनके स्वागत के लिए सिर्फ प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ही थे. शपथ ग्रहण समारोह में भी भाजपा के दो शीर्ष नेता, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह में से कोई भी नहीं पहुंचा था. उनकी शुभकामनाएं भी देर से जारी हुईं. मगर सम्राट ने इसकी परवाह नहीं की. उन्होंने एक-एक कार्यकर्ता को मंच पर बुलाकर खुद उनका अभिवादन स्वीकार किया और तस्वीरें खिचवाईं. इस काम के लिए वे काफी देर तक मंच पर डटे रहे. पार्टी में उनको लेकर उत्साह की कमी की वजह संभवत: यह है कि वे नए हैं, उनका संघ या विद्यार्थी परिषद जैसे संगठनों से आरंभिक जुड़ाव नहीं रहा. उनकी राजनैतिक शिक्षा राष्ट्रीय जनता दल में हुई. और उन्हें सीएम बनाने में नीतीश कुमार का वीटो काम कर रहा था. ऐसे में पार्टी के पुराने नेताओं की निगाह में वे अब तक पराए ही दिखते हैं. इस पराएपन की झलक पूर्व डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा के बयान में भी मिली जब सम्राट के भाजपा विधानमंडल का नेता चुने जाने के बाद उन्होंने मीडिया से कहा, अभी भाजपा में तीसरी और चौथी पीढ़ी सक्रिय है. हमने बरसों बरस खून-पसीना बहाया और बलिदान दिया, तब यह अवसर आया है. मगर हम तो पार्टी के सिपाही हैं, अपने कमांडर के आदेश के अनुसार, गठबंधन की राजनीति को साथ लेकर चलने के लिए हमने सम्राट चौधरी जी के नाम का प्रस्ताव दिया है. मतलब साफ था कि सम्राट को कुर्सी नीतीश कुमार के वीटो की वजह से मिली है. नीतीश के साथ आत्मीयता और लव-कुश रा ज्य के मुंगेर जिले के लखनपुर गांव में 16 नवंबर, 1968 को जन्मे, पूर्व फौजी और राजनेता पिता शकुनी चौधरी की छत्रछाया में राजनीति की शुरुआत करने वाले सम्राट, 2018 में भाजपा में आने से पहले 14 साल राष्ट्रीय जनता दल, एक साल जनता दल (यूनाइटेड), और एक साल हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) की राजनीति कर चुके हैं. इस वक्त वे बिहार में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री हैं जो अपने आप में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है. पिछले तीन-चार दिनों के सम्राट चौधरी के हाव-भाव से ऐसा लगता है कि वे पार्टी की बैठकों में औपचारिक नजर आते हैं और नीतीश कुमार के साथ सहज-सहृदय. नीतीश के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे वाले दिन वे सुबह से ही उनके साथ थे. दोपहर सवा तीन बजे जब नीतीश इस्तीफा देने लोकभवन जा रहे थे तब भी सम्राट उनकी कार की अगली सीट पर विराजमान नजर आए. उन्हें जब एनडीए विधायक दल का नेता चुना गया तो उन्होंने झट से नीतीश कुमार के पांव छू लिए. उनकी यह आत्मीयता उस समय नदारद दिखी, जब भाजपा दफ्तर में उन्हें पार्टी के विधायक दल का नेता चुना गया था. इसके उलट वहां भी वे नीतीश कुमार की तारीफ करने से नहीं चूके. पिछले दो दिनों से जब भी सम्राट चौधरी को अपनी बात कहने का मौका मिलता है, वे नीतीश कुमार का जिक्र जरूर लेकर आते हैं. चाहे सचिवालय में अधिकारियों की बैठक हो या सार्वजनिक मंच. शपथ ग्रहण के बाद अपने सोशल मीडिया में भी उन्होंने नीतीश कुमार को हमारे नेता कहकर संबोधित किया. उनके सरकारी आवास में उनके पिता के ठीक बगल नीतीश कुमार की फोटो टंगी नजर आती है. नीतीश के साथ सम्राट के सहज रिश्तों की वजह उनके पुराने पारिवारिक रिश्ते और लव-कुश समीकरण भी है. सम्राट के पिता शकुनी नीतीश की समता पार्टी के संस्थापक रहे हैं. वे 1995 में पार्टी के सात

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