April 01, 2026
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आपसी समृद्धि में भागीदार
भारत में अमेरिकी राजदूत के तौर पर अपनी पहली सार्वजनिक उपस्थिति में इंडिया टुडे कॉन्क्लेव 2026 के मंच पर सार्जियो गोर ने भारत-अमेरिका रिश्तों की मजबूती पर जोर दिया और कहा कि दोनों देशों के बीच बेहतर राजनीतिक तालमेल बना हुआ है. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच निजी दोस्ताने ने व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने में अहम भूमिका निभाई. गोर ने यह भी कहा कि व्यापार, तकनीकी सहयोग और रणनीतिक समन्वय भारत- अमेरिका संबंधों के तीन प्रमुख आधार हैं. गोर ने हाल ही व्यापार समझौते पर बनी सहमति को पारस्परिक हितों पर आधारित और दोनों पक्षों के लिए लाभकारी बताया. उन्होंने संकेत दिया कि दोनों देश एक महत्वपूर्ण खनिज समझौते पर हस्ताक्षर करने के करीब हैं. उनका कहना था कि महत्वपूर्ण खनिजों के लिए विश्वसनीय और विविध आपूर्ति शृंखलाएं आर्थिक विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों के लिए अपरिहार्य हैं. अमेरिकी पैक्स सिलिका एक अहम पहल रही जो कच्चे माल से लेकर बुनियादी एआइ ढांचे तक संपूर्ण सिलिकॉन पारिस्थितिकी तंत्र सुरक्षित करने का रणनीतिक प्रयास है. इसमें भारत पहले ही एक विश्वसनीय भागीदार है. गोर ने कहा कि भारत का वैश्विक एआइ शिखर सम्मेलन की मेजबानी करना बहुत कुछ कहता है . साथ ही उन्होंने भारत को डेटा संप्रभुता बरकरार रखते हुए उन्नत अमेरिकी तकनीक अपनाने के लिए प्रोत्साहित भी किया. उन्होंने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की मजबूत स्थिति, क्वाड में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका और इसे पुनर्जीवित करने के अमेरिकी इरादे का भी उल्लेख किया. उन्होंने असैन्य एटमी ऊर्जा, एलएनजी, कोयला और कार्बन कैप्चर जैसी नई तकनीकों में संभावित ऊर्जा सहयोग पर चर्चा की. रक्षा संबंधों पर उन्होंने पारंपरिक व्यापार से हटकर अब साझा-उत्पादन, साझा अनुसंधान और साइबर तथा अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में बढ़ते सहयोग की ओर ध्यान आकृष्ट किया. ईरान संघर्ष को गोर ने तेहरान को गोपनीय तौर पर एटम बम बनाने से रोकने के वास्ते जरूरी बताया और कहा कि इससे दुनिया में स्थिरता आएगी. रूसी तेल पर अमेरिकी रुख में बदलावों— पहले प्रतिबंध और फिर उसमें ढील—का बचाव करते हुए गोर ने तर्क दिया कि ये कदम बदलती भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को दर्शाते हैं. वे अब दक्षिण और मध्य एशिया के विशेष दूत भी हैं. उनकी दोहरी भूमिका एक महत्वपूर्ण रणनीतिक संकेत है और यह बदलाव भारत को क्षेत्रीय कूटनीति के केंद्र में लाता है
बड़ी उपलब्धियों और भारी व्यवधानों का दौर
इंडिया टुडे कॉन्क्लेव का 23वां संस्करण एक खास मौका है. इंडिया टुडे (अंग्रेजी) मैगजीन ने अपने प्रकाशन के 50 साल पूरे कर लिए हैं. आज अगर आप इंडिया टुडे समूह को देखें, तो यह एक मल्टी-मीडिया ताकत बन चुका है, जो 75 करोड़ लोगों तक पहुंचता है. लेकिन इसकी शुरुआत एक अकेली पत्रिका से हुई थी—एक ऐसा स्रोत, जहां से सब कुछ आगे बढ़ा. आज वह नींव 50 साल गहरी हो चुकी है. इस आधी सदी में प्रधान संपादक के रूप में मुझे इतिहास को बहुत करीब से देखने का मौका मिला. इन दशकों में मैंने एक ऐसे देश को देखा है जो कि आश्चर्यजनक ढंग से अपने कायापलट में सक्षम है. एक ऐसा मुल्क जो कभी सिर्फ एलडीसी (कम विकसित देश) ही नहीं, बल्कि आरडीसी (विकास से इनकार करने वाला देश) भी कहा जाता था. आज वही भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है. यह सफर आसान नहीं था. आतंकवाद, सामाजिक उथलपुथल, ध्रुवीकरण, दंगे, कत्लो-गारत, प्राकृतिक आपदाएं और युद्ध. इन सबके बीच भारत ने खुद को संभाले रखा. सबसे बड़ी बात यह कि हम एक लोकतंत्र के रूप में टिके रहे, कमियों के बावजूद मजबूत. और यही अपने आप में गर्व और आभार की वजह है. इस बार का कॉन्क्लेव मानो इतिहास के साथ तय हुआ था. ब्रेकथ्रू ऐंड ब्रेकडाउन यानी बड़ी उपल्ब्रिरधयां और बड़े व्यवधान थीम कई महीने पहले तय कर ली गई थी. तब यह अंदाजा नहीं था कि हमारे आसपास ही एक बड़ा युद्ध छिड़ जाएगा, जो हमें याद दिलाएगा कि वैश्विक स्थिरता कितनी नाजुक है. इस युद्ध ने एक तरफ कॉन्क्लेव के कार्यक्रम को प्रभावित किया, कई विदेशी वक्ता नहीं आ सके. दूसरी तरफ, इससे बेहतर समय और क्या हो सकता था जब हम दुनिया को बिना किसी भ्रम के देखें और सोचें कि हम किस दिशा में जा रहे हैं. यही हमेशा हमारे कॉन्क्लेव का मकसद रहा है. हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां मानव इतिहास के सबसे बड़े ब्रेकथ्रू—आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस—को देख रहे हैं. और उसी समय, मानव सञ्जयता के सबसे पुराने ब्रेकडाउन—युद्ध—को भी. विज्ञान, तकनीक और आर्थिक ताकत आज जिस रफ्तार से आगे बढ़ रहे हैं, वह हैरान करने वाली है. लेकिन इसी के साथ संस्थाएं कमजोर पड़ रही हैं, नियम ढीले हो रहे हैं और वैश्विक व्यवस्था दरक रही है. यही हमारे समय का सबसे बड़ा विरोधाभास है. हमारी मेधा भले आर्टिफिशियल हो गई हो लेकिन हमारी प्रवृत्तियां अब भी आदिम ही हैं. हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां एक छोटी-सी गलती—चाहे कूटनीतिक हो या तकनीकी—सालों की प्रगति को किनारे लगा सकती है. विडंबना यह है कि हमारी सबसे उन्नत तकनीकें ही आज युद्ध के तरीके तय कर रही हैं. अब विकास और विघटन अलग-अलग नहीं, बल्कि साथ-साथ चल रहे हैं. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब प्रयोग से निकलकर इस्तेमाल के दौर में पहुंच चुका है. यह उत्पादकता, रचनात्मकता, शासन और रोजमर्रा की जिंदगी...सबको बदल रहा है. जो क्षमताएं कभी बड़े संस्थानों तक सीमित थीं, अब आम लोगों तक पहुंच रही हैं. भारत के पास इस बदलाव से बड़ा फायदा उठाने का मौका है. हमारे पास बड़ा पैमाना है, कौशल है और मजबूत डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर है. हम अब सिर्फ तकनीक के उपभोक्ता नहीं, बल्कि उसे आकार देने वाले भी बन रहे हैं. लेकिन तकनीक अपने साथ खतरे भी लाती है. एआइ काम, असमानता और सामाजिक स्थिरता को लेकर मुश्किल सवाल खड़े करता है. उत्पादकता बढ़ने का मतलब यह नहीं कि समृद्धि सब तक पहुंचेगी. अगर समाज दौलत तेजी से बनाए लेकिन उसे बांटने में पीछे रह जाए, तो प्रगति आसानी से पीछे भी जा सकती है. एआइ आग की तरह है. यह आपका खाना पकाने तो आपका घर जलाने में भी सक्षम है. डीपफेक कुछ ही सेकंड में किसी की भी साख खत्म कर सकते हैं. एल्गोरिद्म समाज को इतनी तेजी से बांट सकते हैं कि हम उसे ठीक भी न कर पाएं.