April 15, 2026
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पहाड़ी प्रदेश में चढ़ा सियासी पारा
अपने कार्यकाल के पांचवें साल की शुरुआत में अब जाकर धामी कैबिनेट पू!र रूप से 12 सदस्यों वाली हो गई. वह भी तब जब अगले साल रा&य में विधानसभा चुनाव होने हैं. मंलिामंडल में किए इस विस्तार के जरिये सरकार ने जातीय समीकर!ा साधने की कोशिश की है. इसी के मद्देनजर भरत चौधरी और राम सिंह कैड़ा के रूप में दो मंलाी ठाकुर समाज से, तो दलित समाज के खजान दास, ब्राह्म!ा समाज के मदन कौशिक एवं पंजाबी समाज के प्रदीप बलाा को मंलिामंडल में शामिल किया गया है. क्षेलाीय संतुलन को देखें तो नए मंलिायों में एक मंलाी कुमाऊं मंडल के पहाड़ी क्षेला से हैं, जबकि दो मंलाी गढ़वाल मंडल के पहाड़ी क्षेला और दो मंलाी मैदानी क्षेलाों से शामिल किए गए. वहीं, पार्टियों के भीतरी राजनैतिक दृष्टि से देखें तो पांच नए मंलिायों में तीन फिर से कांग्रेस पृष्ठभूमि से जुड़े हैं और ऐसे में भाजपा के अपने कोर नेताओं को इसमें तरजीह नहीं मिली है. इन तीन को मिलाकर 12 सदस्यीय मंलिामंडल में सात मंलाी कांग्रेस पृष्ठभूमि से हैं. इन सात में से अधिकतर 2014 के बाद कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए. इसको लेकर विपक्षी कांग्रेस सरकार पर तंज कर रही है कि भाजपा के नेता तो महज पार्टी की ही सेवा के लिए हैं, मंलाी बनकर राज करने के लिए नहीं. वैसे, राजनीति के जानकार इसे राय की बदलती राजनैतिक धारा और भाजपा की र!ानीतिक मजबूती करार दे रहे हैं. मगर, मंलिामंडल विस्तार में किसी महिला को शामिल न करना और पूरी कैबिनेट में माला एक ही महिला मंलाी का होना महिलाओं के प्रतिनिधिठव के दावों की पोल भी खोलता है. हालांकि, मुख्यमंलाी पुष्कर सिंह धामी के विरोधी उम्मीद कर रहे थे कि आगामी चुनाव को देखते हुए और स9ाा विरोधी रुझान के चलते प्रदेश में सरकार का मुखिया बदला जाएगा. लेकिन धामी ने मंलिामंडल विस्तार के जरिए अपनी मजबूत स्थिति का संकेत दे दिया है. मुख्यमंलाी के विरोधी दिी की दौड़ लगा रहे थे. पर धामी ने अपने इस कार्यकाल के आखिरी साल में मंलिामंडल विस्तार में अपनी छाप छोड़कर विरोधियों के मंसूबों पर पानी फेर दिया. उ9होंने न केवल चार साल बेमिसाल के नारे को गढ़ा, बल्कि इसका जश्न मनाने के लिए हरिद्वार और हल्द्वानी में आयोजित रैली में केंद्रीय मंलाी अमित शाह और राजनाथ सिंह ने उनकी जमकर तारीफ की. राजनाथ सिंह ने
क्षत्रपों की अग्निपरीक्षा
एक दिग्गज, दूसरी जुझारू शेरनी, तीसरा अपनी काबिलियत साबित कर चुका राजनैतिक वंशज, और चौथा राजनैतिक दांवपेचों का महारथी. आने वाले विधानसभा चुनावों में ऐसी कद्दावर शख्सियतों के बीच मुकाबला है जिनमें से हरेक का राष्ट्रीय महत्व के एक न एक इलाके पर दबदबा है. पश्चिम बंगाल में लगातार चौथे कार्यकाल की तलबगार ममता बनर्जी भाजपा के खिलाफ ऊंचे दांवों की लड़ाई लड़ रही हैं, वही भाजपा जो इस राज्य को पूरब के अब तक हासिल न हो सके बड़े इनाम की तरह देखती है. केरल में पिनाराई विजयन के लिए दांव वजूद से जुड़े हैं: हार न केवल अस्सी बरस के इस वयोवृद्ध मुख्यमंत्री का बल्कि वामपंथ का भी राजनैतिक शोकगीत लिख सकती है, और कांग्रेस को दक्षिण के पांच राज्यों में से तीन की सत्ता सौंप सकती है. असम और तमिलनाडु में मुकाबला वहां के दिग्गजों के पैर और मजबूती से जमाने का है. सत्ता में कायम रहे तो एम.के. स्टालिन और हेमंत बिस्व सरमा की साख और हैसियत और पुख्ता होगी, और चुनावी जीत लंबे समय तक चलने वाली राजनैतिक पूंजी में बदल जाएगी. आगे के पन्नों में हम हरेक सियासी क्षत्रप की संभावनाओं और चुनौतियों का विश्लेषण कर रहे हैं.