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February 11, 2026

स्थिरता पर भरोसा

लगता है आज की दुनिया जैसे अपनी धुरी से हिल गई है. आर्थिक बेचैनी और राजनैतिक उथल-पुथल महाद्वीपों में फैल रही है और हमारे पड़ोस तक इसका असर दिख रहा है. एक विदेश नीति विशेषज्ञ के शब्दों में, हर दिन एक नई वैश्विक और क्षेत्रीय उथल-पुथल और फिर उसके नए सिरे उभरते हैं. ऐसे माहौल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी साफ तौर पर अलग नजर आते हैं. वे राजनैतिक और आर्थिक मजबूती की नायाब मिसाल पेश करते दिखते हैं. जब दुनिया एक संकट से दूसरे संकट की ओर डगमगा रही है, ऐसे में मोदी का नेतृत्व स्थिरता का प्रतीक बन गया है. यही बड़ी वजह है कि ताजा छमाही इंडिया टुडे-सीवोटर देश का मिज़ाज सर्वे में प्रधानमंत्री को जबरदस्त समर्थन मिला है. यह उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता, सरकार के कामकाज और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की संसदीय स्थिति, तीनों स्तरों पर दिखता है. 2024 के आम चुनाव में पार्टी के अपेक्षाकृत कमजोर प्रदर्शन के बाद जो वापसी हुई है, वह चौंकाने वाली है. 2024 में लोकसभा की 543 सीटों में से भाजपा को 240 सीटें मिली थीं. यह अपने दम पर बहुमत के लिए जरूरी 272 सीटों से 32 कम थीं और 2019 में जीती गई 303 सीटों से काफी नीचे.

एक चुकी हुई ताकत का नाम

जनवरी 2026 का इंडिया टुडे देश का मिज़ाज सर्वेक्षण विपक्ष को ऐसे मोड़ पर खड़ा बताता है, जो दिखने में जितना कमजोर लगता है, असल में उससे कहीं ज्यादा अस्थिर है. विपक्ष, खासकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस नाम की पार्टी अब कहीं भी निर्णायक ताकत के रूप में नहीं दिखती. विपक्ष बोलता लगातार है, जोरदार विरोध प्रदर्शन करता है और नैतिक रूप से श्रेष्ठ होने का दावा करता है, लेकिन इन सबके बावजूद इस सारे किए-धरे को सियासी असर में तद्ब्रदील कर पाने में नाकाम रहता है. वोटर विपक्ष से मुंह नहीं मोड़ रहे, वे उससे ज्यादा की उम्मीद करना छोड़ चुके हैं. इस असहज संतुलन के केंद्र में अब भी राहुल गांधी हैं. वे विपक्ष का सबसे पहचाना जाने वाला चेहरा बने हुए हैं. सर्वे में 28.6 फीसद लोगों ने उन्हें विपक्षी गठबंधन का सबसे उपयुक्त नेता माना. यह आंकड़ा अगस्त 2025 के मुकाबले खास नहीं बदला है. लेकिन तस्वीर तब और साफ होती है, जब लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के तौर पर उनके प्रदर्शन का आकलन किया जाता है. कुल 44 फीसद लोग उनके काम को शानदार या अच्छा मानते हैं जबकि करीब 31 फीसद उत्तरदाता इसे खराब या बहुत खराब बताते हैं. यह बंटवारा ऐसे नेतृत्व की तरफ इशारा करता है, जो एक तबके में तो जोश भरता है, लेकिन दूसरे को भरोसे में नहीं ले पाता. कांग्रेस को लेकर धारणा में भी यही अनिश्चितता झलकती है. अगस्त 2025 में जहां 47.2 फीसद कांग्रेस को बतौर विपक्ष शानदार या अच्छा मानते थे, अब यह गिरकर 41 फीसद रह गया है. गिरावट तब और तेज दिखी जब पूछा गया कि क्या कांग्रेस ही असली विपक्ष है? इस गिरावट की बड़ी वजह यह है कि कांग्रेस मुद्दे उठाने में माहिर है, लेकिन उसे वोट में तद्ब्रदील करने में कमजोर साबित हो रही है. वोट चोरी का नैरेटिव इसकी सबसे उम्दा मिसाल है. संस्थागत पक्षपात, चुनावी मशीनरी पर सवाल और लोकतंत्र को कमजोर करने के आरोप विपक्षी राजनीति के केंद्र में हैं. बौद्धिक तौर पर यह तर्क असरदार लगते हैं, लेकिन चुनावी नतीजों में इसका फायदा नहीं दिखा. बिहार विधानसभा चुनाव इसका ठोस उदाहरण बने. कांग्रेस के भीतर नेतृत्व के प्रश्न पर खींचतान साफ दिखती है. मामूली गिरावट के बावजूद राहुल गांधी 35.6 प्रतिशत समर्थन के सात सबसे आगे बने हुए हैं जबकि मामूली सुधार के साथ प्रियंका गांधी को हासिल समर्थन 8.6 प्रतिशत है. कांग्रेस की नाकामी ने इंडिया ब्लॉक

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