January 28, 2026
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क्या रोबोट अगली शोले लिख सकता है?
हली बार जब मैंने एआइ से बनी कोई फिल्म देखी, तो मेरी प्रतिक्रिया कुछ ऐसी थी: वाह, यह तो कमाल है और साथ ही यह भी कि रुको, कहीं हम मुसीबत में तो नहीं हैं? फिल्म खूबसूरत थी, थोड़ी अजीब भी, लेकिन अजीब तरह से खोखली. जैसे कोई सपना, जहां कैमरा बेहतरीन ढंग से चलता है, शानदार फ्रेम पकड़ता है, लेकिन किरदारों में जान नहीं दिखती. फिलहाल एआइ और फिल्ममेकिंग के बारे में यह राय है. ताज्जुब और बेचैनी के बीच. और सच कहूं तो मैं इससे सहमत हूं क्योंकि हमने ऐसा बदलाव पहले कभी नहीं देखा. यह सिर्फ फिल्मों के बनने के तरीके का बदलाव नहीं बल्कि इस बात का भी है कि फिल्म कौन बना सकता है, कितनी तेजी से बना सकता है और किन औजारों के साथ. मैं हमेशा कहता आया हूं: फिल्ममेकिंग सिर्फ एक माध्यम है. पेशा कहानी कहना है. कोई कलम से कहता है, कोई मंच से. मैंने कैमरा चुना. और अब, धीरे-धीरे, मैं खुद को एआइ टूल्स में प्रॉम्प्ट टाइप करते हुए पा रहा हूं, और स्क्रीन पर तस्वीरों को उभरते देखता हूं, जैसे कोई जादूगर क्या रोबोट अगली शोले लिख सकता है?
एआइ के नए बड़े मोच
उन्नीस सौ पचास में गणितज्ञ और कंप्यूटर वैज्ञानिक ऐलन ट्यूरिंग ने अपने वक्त से बहुत आगे का एक सवाल पूछा था: क्या मशीनें सोच सकती हैं? तब का दौर ऐसा था, जब कंप्यूटर महज मेकैनिकल कैलकुलेटर की तरह काम करते थे. नंबर गिन सकते थे, विचार नहीं. ट्यूरिंग का तर्क था कि बुद्धि चेतना या भावनाओं से नहीं, बल्कि सीखने, तर्क करने और समझदारी से काम करने की क्षमता से तय होती है. यह सोच उससे दशकों पहले आई, जब कंप्यूटिंग पावर, डेटा और एल्गोरिद्म इतने मजबूत नहीं थे कि उसे हकीकत बनाया जा सके. फिर भी इसी विचार ने दुनिया को बुद्धिमान मशीनों की अवधारणा से परिचित कराया. 2026 में देखें तो यह सफर इंसानी तरक्की के नए चरण—पांचवीं औद्योगिक क्रांति— में पहुंच चुका है, जो है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोजमर्रा की जिंदगी में उसका दखल.