March 11, 2026
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निकोबार पर नया विवाद
खतरे म लेदरबैक समुद्री कछुआ दुनिया का सबसे बड़ा समुद्री कछुआ लेदरबैक (डर्मोचेलिस कोरियासी) दो मीटर तक लंबा हो सकता है और उसका वजन 600 किलो से ज्यादा होता है. उसे अपना नाम अपनी मांसल खोल के कारण मिला है, जो चमड़े जैसा लगता है. दूसरे समुद्री कछुओं के उलट, लेदरबैक कछुओं की चमड़ी सख्त नहीं होती. पूर्वोîार हिंद महासागर के निकोबार द्वीप समूह में इस लुप्तप्राय प्रजाति के लगभग 94 फीसद ठिकाने (1,000 से ज्यादा) हैं. रोशनी, शोर और समुद्री तटों की स्थिरता में हल्की-सी हलचल भी उनके अंडों से निकलने वाले शिशु कछुओं की जिंदगी के लिए जोखिम पैदा कर सकती है. अंदेशा: पर्यावरणविद् बताते हैं कि गैलाथिया खाड़ी इन कछुओं का बड़ा ठिकाना है. इस इलाके का वर्गीकरण तटीय क्षेत्र नियमन (सीआरजेड)—1ए के तौर पर किया गया है, जिसका मतलब है कि यह पारिस्थितिकी के लिहाज से बेहद संवेदनशील इलाका है जहां निर्माण गतिविधियों पर पूरी तरह रोक है. वे चेतावनी देते हैं कि बंदरगाह बनाने की प्रस्तावित योजना के लिए लाखों टन रेत और गाद निकालने की जरूरत होगी, जिससे इन नाजुक इलाकों की स्थिति हमेशा के लिए बर्बाद हो सकती है और कछुओं की रिहाइश खत्म हो सकती है. जवाब: पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के मुताबिक, जून 2023 में विशेषज्ञों के नेतृत्व में जमीनी सचाई जानने की कवायद की गई. उस समीक्षा में पाया गया कि परियोजना का कोई भी हिस्सा सीआरजेड-1ए जोन में नहीं आता है. मंत्रालय ने ग्रेट निकोबार आइलैंड के पश्चिमी तट पर पेमय्या के आसपास 13.75 वर्ग किमी इलाके में लेदरबैक कछुआ अभयारण्य और 500-मीटर का संरक्षित बफर जोन बनाने का भी प्रस्ताव किया है. गैलाथिया खाड़ी, पेमय्या खाड़ी, अलेक्जेंड्रिया खाड़ी, कैजुरीना खाड़ी और डोगमार के पश्चिमी किनारे समेत महत्वपूर्ण घोंसले वाले समुद्री तटों को सख्ती से नो-डेवलपमेंट जोन का दर्जा दिया गया है और कछुओं के ठिकानों की सुरक्षा आश्वस्त करने के लिए घोंसले बनाने और अंडे सेने के सीजन के दौरान उन पर निरंतर निगरानी रखी जाएगी.
जातिगत वर्चस्व की जंग
पूर्वांचल की सियासत में 22 फरवरी का दिन सिर्फ दो रैलियों का दिन नहीं था, वह राजभर राजनीति के भीतर चल रही गहरी खींचतान का खुला प्रदर्शन था. एक ही सरकार के दो कैबिनेट मंत्री, दोनों राजभर समाज से, दोनों पूर्वांचल में प्रभाव का दावा करने वाले और दोनों ने आजमगढ़ की धरती को अपनी-अपनी ताकत दिखाने का मंच बना लिया. पूर्वांचल एक्सप्रेसवे के दोनों ओर करीब 30 किलोमीटर के दायरे में हुए इन दो आयोजनों ने साफ कर दिया कि यह टकराव अब व्यक्तिगत कटाक्ष से आगे बढ़कर नेतृत्व की निर्णायक लड़ाई बन चुका है. आजमगढ़ जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर अहिरौला के जनता इंटर कॉलेज का मैदान पीला गमछा पहने कार्यकर्ताओं और पीली झंडियों से पटा था. यहां योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर ने सामाजिक समरसता रैली की. इसी दिन यहां से करीब 30 किलोमीटर दूर माहुल के टिकुरिया मैदान में श्रम मंत्री अनिल राजभर महाराजा सुहेलदेव जयंती के उपलक्ष्य में जनसभा कर रहे थे. वहां भगवा रंग छाया हुआ था और पूर्वांचल के करीब 15 जिलों से समर्थक जुटाने का दावा किया गया. दोनों मंचों से सीधे नाम लिए बिना एक-दूसरे पर वार हुए. अहिरौला में सुभासपा के मंच से सामाजिक न्याय, भागीदारी और सम्मान की बात हुई. ओमप्रकाश राजभर ने सीधे तौर पर किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन उनके भाषण के केंद्र में यह संदेश था कि राजभर समाज को कोई खरीद या बेच नहीं सकता. उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग आरोप लगाते हैं, वे बताएं कि वोट कहां बिकता है. दूसरी ओर, टिकुरिया मैदान में अनिल राजभर ने महाराजा सुहेलदेव की विरासत को केंद्र में रखकर अपनी बात कही. उन्होंने भी सीधे नाम लिए बिना आरोप लगाया कि समाज को बांटने और महाराजा सुहेलदेव