April 22, 2026
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घायल गल्फ
अमेरिका-इज्राएल और ईरान जंग 39 दिन चलने के बाद 7 अप्रैल को प्रमुख पक्षों की ओर से दो हफ्ते की जंगबंदी का ऐलान हुआ. उसके बाद से मिसाइलों और ड्रोन की खौफनाक आवाजें कुछ थमती दिख रही हैं. यह रजामंदी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की समूची सञ्जयता को मिटा देने की धमकी की डेडलाइन खत्म होने के चंद घंटे पहले हुई. बावजूद इसके, समूचे खाड़ी क्षेत्र में शायद कोई इस भुलावे में है कि यह तनाव भरा ठहराव टिकाऊ अमन में बदलेगा. पूरे इलाके में इतने बड़े पैमाने पर तबाही हाल की याददाश्त में लोगों ने कभी नहीं देखी थी. इससे खाड़ी देशों की कमजोरियां खुलकर सामने आ गईं, उसके आर्थिक इंजन के डैने टूटकर बिखर गए. करीने से बनाई गई स्थिरता की उसकी छवि ऐसी तार-तार हुई कि उसे दुरुस्त करने में वर्षों लग सकते हैं. सऊदी अरब से लेकर संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), कतर से लेकर ओमान और समूचा बहरीन तथा कुवैत...खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के सभी छह देश एक जैसी अजब हकीकत से रू- ब-रू हुए कि जंग भले उनकी न हो मगर तबाही तो उनके जिम्मे है. एक विशेषज्ञ बेबाक कहते हैं कि जंग ने इन देशों में सुरक्षा और समृद्धि के वर्षों से करीने से किए गए निवेश को चौपट कर दिया. इसलिए यह जंगबंदी अंत नहीं, सिर्फ ठहराव है. इससे ऐसी खाड़ी का नजारा सामने आया है, जो जख्मी है, घबराई है और नए सिरे से सोच-विचार में जुटी है. खाड़ी देशों को जंग की कीमत झेलनी पड़ रही है, तो उसकी वजह जख्मी ईरान की बेहद जोखिम भरी दोतरफा रणनीति है, जिसके जरिए उसने अमेरिका और इज्राएल की बड़ी पारंपरिक फौजी ताकत से लोहा लिया, अपनी हुकूमत को धराशाई होने से बचाया और अपनी एटमी तथा मिसाइल क्षमताओं को भी कायम रखा. इस मामले में उसका पहला हथियार दुनिया की अर्थव्यवस्था की महाधमनी होर्मुज जलडमरूमध्य है, जिससे होकर दुनिया के कच्चे तेल का 25 फीसद और 20 फीसद तरल प्राकृतिक गैस के अलावा खाद, एल्युमिनियम और दूसरे अहम औद्योगिक कच्चे माल की खेप गुजरती है. यह खासकर दक्षिणी और पूर्वी
दमदार है इस बार भाजपा का दांव
अमित शाह दो अप्रैल को जब भवानीपुर में एक रैली को संबोधित कर रहे थे तो उनका अंदाज काफी नपा-तुला नजर आया. वह तेजी और आक्रामकता इस बार नहीं थी, जो 2021 में दिख रही थी जब केंद्रीय गृह मंलाी (294 सदस्यीय विधानसभा में) पार्टी के 200 से यादा सीटें जीतने की भविष्यवा!ाी कर रहे थे. इस बार नेता विपक्ष और यहां से पार्टी उम्मीदवार शुभेंदु अधिकारी के लिए वोट मांगते हुए शाह ने लक्ष्य को ाटाकर कम से कम 170 सीटें कर दिया. दावे में सीटों की संख्या भले ाटा दी गई हो लेकिन आठमविश्वास में कतई कमी नहीं आई है. बंगाल में लंबे समय से कमजोर संगठन को लेकर आलोचनाएं झेलती रही भाजपा का मानना है कि उसने बूथ स्तर से खुद को फिर खड़ा कर लिया है. नंदीग्राम से उम्मीदवार अधिकारी का दूसरी सीट भवानीपुर से भी पर्चा भरनाजहां वे मुख्यमंलाी और तृ!ामूल कांग्रेस अम्यक्ष ममता बनर्जी को उनके ही गढ़ में चुनौती दे रहे हैंजाहिर तौर पर पार्टी की इसी आक्रामक सियासी र!ानीति का हिस्सा है. बंगाल में वर्षों तक भाजपा ने ााटे में दिखते हुए शुरुआत की है. यहां लगभग 30 फीसद मतदाता मुसलमान हैं, और यह तबका तृ!ामूल के पीछे लामबंद रहा है. भाजपा की चुनौतियां यहीं तक सीमित नहीं थीं. हिंदू-बहुल इलाकों में भी पार्टी अॠसर खुद को बूथ-स्तर पर कमजोर स्थिति में पाती थी. 2021 के विधानसभा चुनाव, खासकर चुनाव के बाद की हिंसा ने, इस कमजोरी को खुलकर सामने ला दिया. दूसरे रायों से जो नेता आए थे, वे चुनाव के तुरंत बाद चले गए और स्थानीय नेताओं तक पहुंचना आसान न था. भाजपा के जमीनी स्तर के तमाम कार्यकर्ताओं को लगा कि उ9हें ऐसे ही छोड़ दिया गया है; इसका गहरा मनोवै#ाानिक असर हुआ. कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटा, नेटवर्क भी खठम हो गया. लेकिन पार्टी का वोट बैंक पूरी तरह खठम नहीं हुआ. 2023 के पंचायत चुनाव में हिंसा के व्यापक आरोपों के बावजूद भाजपा ने 9,700 से यादा ग्राम पंचायत सीटें जीतीं (63,000 से यादा कुल सीटों में से 15 फीसद से यादा). इसने संकेत दिया कि मतदाताओं का एक तबका डराने-धमकाने की ाटनाओं के बावजूद भाजपा का पुरजोर समर्थन करता है. बंसल का द्ब्रलूप्रिंट रा य इकाई में बड़े बदलाव का जिम्मा पार्टी महासचिव सुनील बंसल को सौंपा गया था, जि9हें अगस्त 2022 में बंगाल के लिए केंद्रीय पर्यवेक्षक बनाया गया. उनसे पहले इस पद पर मम्य प्रदेश के नेता कैलाश विजयवर्गीय थे, जो विवादों में िारे रहे हैं. तृ!ामूल छोड़कर पार्टी में शामिल होने वालों को टिकट देने की उनकी र!ानीति की पार्टी के भीतर ही खासी आलोचना हुई थी. पार्टी में संगठनाठमक बिखराव और 2021 की हार के लिए भी उ9हें ही जिम्मेदार ठहराया गया था. बंसल का नजरिया एकदम अलग था. महीनों तक उ9होंने पूरे बंगाल का दौरा किया, तमाम स्तरों पर बैठकें कीं, पार्टी के भीतर गुटों की परस्पर खींचतान को समझा और संगठन की खूबियों-खामियों को चिि9हत किया. हालांकि, इस काम में असली तेजी 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद आई. उसी साल अॠतूबर में शाह ने बंगाल में महठवाकांक्षी सदस्यता अभियान की शुरुआत की, जिसके तहत 15 जनवरी, 2026 तक एक करोड़ नए सदस्य बनाने का लक्ष्य रखा गया. हालांकि, उनका यह लक्ष्य पूरा नहीं हो