May 27, 2026
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शुरू हुआ सîईस का गुणा-गणित
पश्चिम बंगाल में चुनावी विजय के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) बिना देर किए मिशन-यूपी में जुट गई जहां 2027 के शुरू में विधानसभा चुनाव होने हैं. यही वजह थी कि 9 मई को कोलकाता में भाजपा सरकार के शपथ ग्रहण समारोह से लखनऊ लौटते ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राज्यपाल आनंदीबेन पटेल से मुलाकात की. इसमें अगले दिन 10 मई की दोपहर मंत्रिमंडल विस्तार का समय मुकर्रर हो गया. यह विस्तार केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि 2027 के चुनावी युद्ध का औपचारिक शंखनाद था. छह नए मंत्रियों की एंट्री और दो राज्य मंत्रियों के प्रमोशन के जरिए भाजपा ने साफ संकेत दिया कि वह समाजवादी पार्टी (सपा) के पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक गठजोड़ की चुनौती को उसी सामाजिक धरातल पर जवाब देने जा रही है. दरअसल, 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों ने भाजपा को यह एहसास कराया था कि उत्तर प्रदेश में सिर्फ हिंदुत्व और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के भरोसे चुनावी बढ़त कायम रखना अब आसान न होगा. सपा के पीडीए अभियान का असर कई सीटों पर दिखाई दिया. उत्तर प्रदेश में भाजपा 33 सीटों पर सिमट गई जबकि सपा 36 सीटें जीतने में सफल रही. इंडिया गठबंधन को कुल 43 सीटें मिलीं. यही नतीजे भाजपा के भीतर सामाजिक समीकरणों की नई समीक्षा की वजह बने.ैर-यादव ओबीसी पर दांव योगी मंत्रिमंडल विस्तार का सबसे स्पष्ट संदेश गैर-यादव पिछड़ा वर्ग को लेकर सामने आया. नए मंत्रियों में हंसराज विश्वकर्मा, कैलाश सिंह राजपूत और भूपेंद्र चौधरी जैसे चेहरे अलग-अलग ओबीसी समूहों को साधने की रणनीति का हिस्सा माने जा रहे हैं. राजनैतिक विश्लेषक और अवध गर्ल्स कॉलेज लखनऊ की प्राचार्य बीना राय बताती हैं, भाजपा जानती है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में गैर-यादव पिछड़ा वर्ग निर्णायक भूमिका निभाता है. वर्ष 2014 से 2022 तक पार्टी की सबसे बड़ी ताकत यही सामाजिक गठबंधन रहा. लेकिन लोकसभा चुनाव में इस वर्ग के कुछ हिस्सों में नाराजगी दिखाई दी. ऐसे में वाराणसी से आने वाले विश्वकर्मा को मंत्री बनाकर पार्टी ने विश्वकर्मा समुदाय को सीधा राजनैतिक संदेश दिया है कि सत्ता में उनकी भागीदारी अब भी सुरक्षित है. हाल के महीनों में विश्वकर्मा समाज को लेकर विपक्ष ने भाजपा पर उपेक्षा के आरोप लगाए थे. गाजीपुर की एक घटना को लेकर समाजवादी पार्टी ने इसे सवर्ण अत्याचार बनाम पिछड़ा सम्मान का मुद्दा बनाने की
अब आगे की चुनौतियां
खासे थकाऊ चुनावी मुकाबले के बाद चार मुख्यमंत्री अपने प्रदेशों की बागडोर संभाल रहे. इनमें से तीन तो पहली बार गद्दीनशीन हो रहे हैं और एक की दूसरी पारी है. हरेक के सामने हाजिर प्राथमिकताओं पर एक नजर. इनमें राजनैतिक स्थिरता सुनिश्चित करने से लेकर निवेश आमंत्रित करने, समावेशी विकास और विîाीय प्रबंधन तक शामिल