June 24, 2026
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हद दर्जे की लापरवाही
यह एक ऐसी गली है जो दिल्ली के दर्जनों शहरी गांवों में से किसी में भी देखने को मिल सकती है. अंधेरी और संकरी गलियां जहां सूरज की रोशनी नहीं पहुंचती क्योंकि एक के ऊपर एक रखी माचिस की डिब्बियों जैसी इमारतों और चारों तरफ लटकते बिजली के तारों के जाल में वह उलझकर रह जाती है. मालवीय नगर और साकेत के बीच कसमसाता हौज रानी भी बाकी जगहों से अलग नहीं. बुरी तरह ट्रैफिक जाम का शिकार. मगर साकेत के अस्पतालों के सामने बसे होने के चलते यहां के पुराने बाशिंदों और किराएदारों के साथ सस्ते कमरों की तलाश में आने वाले मेडिकल टूरिस्ट्स की भीड़ भी जुड़ गई है. फ्लोरिश स्टे भी इन्हीं के लिए था. नीचे रेस्तरां और ऊपर बीऐंडबी (बेड ऐंड ब्रेकफास्ट), यानी रात भर ठहरने की सुविधा और सुबह का नाश्ता. छह कमरों के लाइसेंस पर करीब 28 कमरे चल रहे थे यानी ऐसा उल्लंघन जिस पर दिल्ली में आमतौर पर कोई ध्यान नहीं देता. लेकिन तीन जून की सुबह, पांच मंजिला यह इमारत दिल्ली के पिछले कई बरसों के सबसे भयावह हादसों में से एक की गवाह बन गई. आग की संभावित वजह एक इले्ट्रिरक ऑयल फ्रायर था जो बहुत ज्यादा गरम हो गया और उससे चिंगारी निकली. जैसे ही आग ने रसोई को अपनी चपेट में लिया, दहशतजदा रसोइए ने भागने से पहले बिजली के मेन स्विच बंद कर दिए. अनजाने किए इस काम से इमारत का इलेक्ट्रॉनिक डोर लॉकिंग सिस्टम ठप हो गया और मेहमान भीतर के कमरों में फंस कर रह गए.
जकड़बंदी से महामुक्ति
वर्ष 1991 की गर्मियों में पी.वी. नरसिंह राव और उनके वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने लाइसेंस राज को चलता किया था. पैंतीस साल बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कुछ वैसा ही बड़ा काम करने की कोशिश कर रहे हैं. 10 जून को वे जवाहरलाल नेहरू के 4,398 दिनों के रिकॉर्ड को पीछे छोड़कर सबसे लंबे समय तक पद पर रहने वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री बन गए. मोदी अब व्यवस्थित ढंग से उस व्यवस्था को तोड़ रहे हैं, जिसे उद्योग जगत के कई लोग देश का रेगुलेटरी राज कहते हैं. हालांकि, 1991 की तरह इस बार कोई बड़ा धमाकेदार ऐलान नहीं है. उसके बजाए हजारों बदलाव चुपचाप हो रहे हैं. उनमें आपराधिक धाराएं हटाना, जरूरी मंजूरियां खत्म करना, बेमानी हो चुके लाइसेंस नियमों और जांच-पड़ताल की उन व्यवस्थाओं को हटाना शामिल है, जो भारतीय उद्यमियों के लिए बाधा बनती थीं और उन्हें संभावित अपराधी की तरह देखती थीं. अभी की कवायद किसी भी पैमाने पर उदारीकरण के बाद सबसे व्यापक प्रशासनिक सुधारों में से एक है. इसमें सैकड़ों मामूली खामियों को अपराध की श्रेणी से हटाना, नियमों और अनुपालन के जाल को ढीला करना, क्वालिटी-कंट्रोल से जुड़े आदेशों और राज्य स्तर की मंजूरियों की उलझन को कम करना शामिल है. इसके दार्शनिक केंद्र में एक बड़ा विचार है—जन विश्वास. सीधे कहें तो भारतीय राज्य को लोगों पर भरोसा करना सीखना होगा. रेगुलेटरी सुधार पर सरकार के थिंक-टैंक के अहम सदस्य तथा टीमलीज सर्विसेज के सह-संस्थापक मनीष सभरवाल कहते हैं, 1991 के सुधारों ने इंड्ट्रिरयल लाइसेंसिंग को खत्म किया लेकिन फिर वह मंजूरी और अनुपालन राज में बदल गया. सभरवाल सही कह रहे हैं. 1991 से 2024 के बीच भारत ने औद्योगिक लाइसेंसिंग व्यवस्था तो छोड़ दी, लेकिन उसकी जगह चुपचाप लगभग उतनी ही बोझिल व्यवस्था खड़ी हो गई—पर्यावरण मंजूरियां, फैक्ट्री लाइसेंस, क्वालिटी-कंट्रोल आदेश, नगरपालिका की मंजूरियां, लेबर इंस्पेक्टरों के दौरे और सालाना कंप्लाएंस फाइलिंग का पूरा तंत्र. सबसे छोटे उद्यम को भी हर साल 1,400 से ज्यादा नियम-कायदों के पालन की जरूरत पड़ती थी और रोजाना दर्जनों नियम संबंधी बदलावों पर नजर रखनी होती थी. अलग-अलग देखें तो हर शर्त मुनासिब लग सकती थी. लेकिन इन सारी शर्तों ने मिलकर वह चीज बना दी, जिसे सभरवाल रेगुलेटरी कोलेस्ट्रॉल कहते हैं. यह शब्द सभरवाल ने यह बताने के लिए गढ़ा कि कैसे जरूरत से ज्यादा कंप्लायंस ने आर्थिक गतिविधि की धमनियों को जाम कर दिया था. ऐसी कई रुकावटों से वाकिफ मोदी ने 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद मंत्रालयों से 40,000 से ज्यादा गैर-जरूरी अनुपालन खत्म करवाए और दर्जनों कानूनों में बदलाव कराए, ताकि वे आम लोगों के लिए कम डराने वाले बनें. लेकिन वे जानते थे कि अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है. दिसंबर 2024 में राज्यों के मुख्य सचिवों के राष्ट्रीय सम्मेलन में, जिसकी अध्यक्षता वे कर रहे थे, मोदी ने मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन से रेगुलेटरी बोझ की भारी आर्थिक लागत पर विस्तृत प्रेजेंटेशन दिलवाया.