September 09, 2026
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तूफानी लहरों पर टिकी नाव
विश्व की आर्थिक और सुरक्षा व्यवस्था पश्चिम एशिया में रुक-रुककर चलते संघर्ष, रूस-यूक्रेन के लगातार जारी युद्ध और अमेरिका में ट्रंप प्रशासन के पल में तोला पल में माशा वाले रवैए की वजह से तार-तार होती जा रही है. ऐसे में भारत की विदेश नीति का मतलब रहा है अपने पैंतरों और बाजीगरी के लिए जगह बनाना. भारत बहुत-से देशों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलते हुए रणनीतिक स्वायत्तता हासिल करने का जतन कर रहा है. इसका अर्थ है अमेरिका और पश्चिमी शक्तियों के साथ साझेदारी को गहरा करना, रूस के साथ रक्षा और ऊर्जा संबंध बनाए रखना, चीन के साथ पेचीदा रिश्तों को संभालना और ग्लोबल साउथ में अपनी आवाज और मजबूत करना.विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने हाल में कहा था, "होड़, टकराव और आर्थिक तथा सामरिक ताकत का लगातार बढ़ता इस्तेमाल" दुनिया की नई इबारतें गढ़ रहा है. यह वह हकीकत है जिसकी वजह से भारत को व्यावहारिक रवैया अपनाना पड़ा ताकि वह एक या दूसरे खेमे को चुनने से बच सके और अपने हितों की रक्षा कर सके. इसे इंडिया टुडे के देश का मिजाज सर्वे की भी स्वीकृति मिली है, जिसमें 51 फीसदी से ज्यादा लोगों ने विदेश नीति को संभालने के मोदी सरकार के तौर-तरीके की सराहना की. हालांकि 28 फीसदी लोगों की राय इस पर नकारात्मक थी.डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के दौरान भारत-अमेरिकी रिश्तों में उतार-चढ़ाव आए. भारतीय उत्पादों पर अमेरिकी टैरिफ और ट्रंप की जबान से निकली पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व की तारीफों ने रणनीतिक साझेदारी को कसौटी पर कस दिया. अलबत्ता, भारत-अमेरिकी रिश्ते साझा हितों और ठोस नतीजों से गढ़े गए हैं. अमेरिका की तरफ से भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) को अपने मून बेस कार्यक्रम से जुड़ने का न्योता गहरे होते अंतरिक्ष सहयोग का संकेत है, तो भारत की तरफ से 1,943 करोड़ रुपये में 30 महीने की लीज पर दो एमक्यू-9बी सीगार्जियन ड्रोन लेना इस साझेदारी के सुरक्षा पहलू को सामने रखता है. भारत-अमेरिकी संबंधों की सबसे अच्छी बात के बारे में देश का मिजाज सर्वे के
चेतावनी के संकेत
इसी साल मई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने तीसरे कार्यकाल में पहले से कहीं ज्यादा अजेय दिखाई दे रहे थे. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारी जीत हासिल की थी. यह न सिर्फ पूर्वी भारत के एक प्रमुख राज्य में भाजपा की पहली ऐतिहासिक जीत थी, बल्कि उससे 2024 के लोकसभा चुनाव में लगे झटके के बाद बिहार, महाराष्ट्र, असम, हरियाणा और दिल्ली के विधानसभा चुनावों में पार्टी की शानदार जीत का एक चक्र भी पूरा हुआ था.बंगाल की इस बड़ी जीत के बाद भाजपा और उसके सहयोगियों की सरकार देश के 31 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में से 22 तक में फैल गई. इससे लगा कि पार्टी ने लोकसभा चुनाव में बहुमत न मिलने से पैदा हुई अनिश्चितता को पीछे छोड़ दिया है. उस चुनाव में भाजपा को 240 सीटें मिली थीं, जो 272 के साधारण बहुमत से 32 कम थीं. इसलिए उसे केंद्र में सरकार बनाने के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सहयोगी दलों पर निर्भर होना पड़ा था.इसलिए मोदी सरकार झटकों के लिए पूरी तरह तैयार नहीं थी, जब एक के बाद एक कई प्रतिकूल हालात ने प्रधानमंत्री और सत्तारूढ़ पार्टी, दोनों को बचाव की मुद्रा में ला दिया. मोदी खुद को लगातार ऐसी हालत में फंसा हुआ पाने लगे, जहां देश के भीतर और विदेश नीति के मोर्चों, दोनों तरफ मुश्किलें थीं, यानी आगे कुआं, पीछे खाई.बंगाल में भाजपा की जीत का जश्न अभी अपने चरम पर पहुंच ही रहा था कि मोदी सरकार के लिए मुश्किलें पैदा होने लगीं. मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए 3 मई को हुई 2026 की राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) का प्रश्नपत्र लीक हो गया. इससे केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय को परीक्षा रद्द करनी पड़ी. एक अनौपचारिक टिप्पणी से जन्मी कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) को जंतर मंतर पर विशाल विरोध प्रदर्शन करने का सही मौका मिल गया. यह आंदोलन आखिरकार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर जाकर खत्म हुआ.यह संकट अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था कि ईरान और अमेरिका के बीच समझौता टूटने के बाद महंगाई फिर बढ़ने लगी. इससे होर्मुज जलडमरूमध्य में दोनों देशों के बीच नुकसानदेह टकराव और लंबा खिंच गया तथा भारत के लिए कच्चे तेल की कीमतें बढ़ गईं. सरकार की चिंता बढ़ाने वाली एक और वजह अल नीनो का खतरा और अनियमित बारिश थी. इससे खेती के उपज में तेज गिरावट का अंदेशा पैदा हो गया. कई संकटों का प्रधानमंत्री पर असर इन एक साथ उभरे कई संकटों का प्रधानमंत्री और सत्तारूढ़ पार्टी की लोकप्रियता पर पड़ा असर इंडिया टुडे-सीवोटर के ताजा छमाही देश का मिजाज जनमत सर्वेक्षण में साफ दिखाई देता है. इस सर्वेक्षण के मुताबिक, अगर अभी लोकसभा चुनाव होते हैं तो भाजपा 261 सीटें जीतेगी, जो अपने दम पर साधारण बहुमत से 11 सीटें कम हैं. यह जनवरी के सर्वेक्षण से 26 सीटों की गिरावट है. उस सर्वेक्षण में भाजपा के लिए 287 सीटों का कहीं अच्छी स्थिति का अनुमान लगाया गया था. इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि ताजा सर्वेक्षण के मुताबिक, पार्टी को पश्चिम बंगाल में जीत नहीं मिली होती तो सीटें ज्यादा घटतीं.