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June 17, 2026

ममता से बगावत

वह तालियों की गड़गड़ाहट शायद उस पल के रूप में याद रखी जाएगी जब आखिरकार बिखराव शुरू हो गया था. विधानसभा चुनाव में सनसनीखेज हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) विधायक दल की वह पहली बैठक थी. सबकी बातें लगभग मिलती-जुलती हैं: कथित रूप से विधायकों को सत्ता से बेदखल मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे और टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के लिए खड़े होकर तालियां बजाने को कहा गया था. कई विधायकों को यह अजीब लगा. बहुतों को बहुत अजीब. फिर क्या, दबी हुई नाराजगी बगावत के रूप में फूट पड़ी. खामोश असंतुष्टों को किसी के ईदगिर्द संगठित होने के लिए अब एक नया चेहरा मिल गया. वह थे उलुबेरिया पूर्व के विधायक ऋतब्रत बनर्जी. वह कोलकाता के फायरब्रान्ड वामपंथी छात्रनेता रहे हैं, जिन्हें सीपीएम ने 2014 में राज्य सभा भेजा था. ऋतब्रत 2018 में टीएमसी की ओर मुड़ गए और उसकी बदौलत उन्हें एक और कार्यकाल मिल गया. सीपीएम ने अंदरूनी जानकारियों को लीक करने का आरोप लगाते हुए उन्हें निष्कासित कर दिया था. लगभग उसी तरह एक बार फिर उन पर अपनी पार्टी को नुकसान पहुंचाने के आरोप लग रहे हैं. ममता खेमे ने वरिष्ठ विधायक सोवनदेव चट्टोपाध्याय को विपक्ष के नेता के पद के लिए नामित किया था. सबसे पहले 9 मई को अभिषेक ने उनके नाम का ऐलान किया. असहमति के संकेतों के बीच, विधानसभा के प्रधान सचिव ने उनसे यह स्पष्ट करने के लिए जोर दिया कि क्या वह टीएमसी का आधिकारिक चयन हैं. फिर अभिषेक ने 20 मई को 70 विधायकों के हस्ताक्षर के साथ पार्टी का एक प्रस्ताव पेश किया. जल्द ही यह बात फैलने लगी कि उस नाम पर सहमति दिखाने के लिए फर्जी हस्ताक्षर किए गए हैं. दिल्ली में 22 मई को मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के साथ ऋतब्रत की एक आकस्मिक मुलाकात हुई, मगर अंदरूनी नाराजगी को पूरी तरह बाहर आने में एक हफ्ता लग गया. 27 मई को ऋतब्रत और एक अन्य विधायक ने औपचारिक रूप से 14 हस्ताक्षरों में जालसाजी का आरोप लगाया. वे कथित रूप से बड़े अक्षरों में किए गए थे. असंतुष्ट विधायकों का कहना था कि उनसे कोई सलाह नहीं ली गई. ऋतब्रत को एक और निष्कासन का सामना करना पड़ा और उन्होंने 3 जून को विधानसभा तक मार्च करके बगावत को तेज कर दिया. वे टीएमसी के 80 में से 58 विधायकों का समर्थन पत्र साथ लेकर गए थे. यह संख्या सदन में प्रमुख विपक्षी समूह के रूप में मान्यता के लिए आवश्यक 10 फीसद की सीमा से काफी अधिक था. ऋतब्रत को विधिवत रूप से विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता दी गई. उनके साथ नौ पूर्व मंत्री और 28 मुस्लिम विधायक भी हैं. ऋतब्रत के सहयोगी चार बागी विधायक संदीपन साहा, जावेद खान, सबीना यास्मीन और शेली साहा अब सदन में उपनेता हैं. ऐसे में विधायी विंग अब ममता के हाथ से छिटक गया है. टीएमसी के लिए यह मरणासन्न स्थिति लगती है. पार्टी में अंदरूनी असंतोष वर्षों से सुलग रहा था. ममता ने मानो इसे एक विशाल युद्धक विमान की तरह स्थापित किया था, मगर पार्टी के भीतर सबको उभरने का मौका नहीं था. वरिष्ठ नेताओं के लिए जगह

साइबरकॉन्ड्रिया नए जमाने का मज

सात महीने पहले, 41 साल के रितोबान सेन ने अपने घुटने पर एक छोटी-सी गांठ देखी. सेन इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, अहमदाबाद से पढ़े हैं और मुंबई के एक बड़े बैंक में काम करते हैं. परिवार में कैंसर की हिस्ट्री होने की वजह से उनकी चिंता बढ़ती गई. उन्होंने हर छोटी-बड़ी जानकारी चैटजीपीटी में डाल दी. जवाब में उन्हें लंबी-चौड़ी व्याख्या मिली, जिसमें बोन कैंसर की आशंका जताई गई थी. सेन ने मुंबई में तीन कैंसर विशेषज्ञों से सलाह ली. तीनों ने इसे साधारण सूजन बताया और बायोप्सी की जरूरत से इनकार किया. फिर भी वे संतुष्ट नहीं हुए. चौथी राय लेने के लिए वे न्यूयॉर्क सिटी चले गए. वहां भी वही नतीजा निकला. सेन हंसते हुए कहते हैं, अब मुझे बेवकूफी लगती है, लेकिन उस समय फिक्र बहुत ज्यादा थी. पहले के हाइपोकॉ्ड्रिरएक मामूली शारीरिक लक्षण को भी किसी गंभीर बीमारी का संकेत मान बैठते थे. अब उनके पास अपने सबसे बड़े डर की पुष्टि करने वाला एक औजार है: डॉ. चैटजीपीटी. दोनों ने मिलकर एक नया किरदार पैदा किया है, जिसे साइबरकॉ्ड्रिरएक कहा जा सकता है. ऐसा शख्स जो ऑनलाइन लक्षण खोजने से शुरू करता है, लेकिन जल्दी ही बार-बार और जुनूनी ढंग से चेक करने के चक्र में फंस जाता है. हर नतीजा उसकी चिंता कम करने के बजाए और बढ़ा देता है.

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