September 02, 2026
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सीजेपी क्या वे बदलाव ला सकते हैं?
बच्चे खुद गिनती-हिसाब लगाते हुए मोबाइल पर अपनी शिकायतें रिकॉर्ड कर रहे हैं. महाराष्ट्र के हिंगोली जिले के संतुक पिंपरी गांव के सरकारी स्कूल में वे सारी कमियां गिनाते हैं: बेंच, साफ पानी, इस्तेमाल के लायक शौचालय, चालू कंप्यूटर... कुछ भी ठीक से उपलब्ध नहीं... यहां तक कि पर्याप्त शिक्षक भी. यह स्कूल कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के राष्ट्रीय संयोजक अभिजीत दीपके के पुश्तैनी गांव में है. उनकी इंस्टा पोस्ट वायरल होते ही दूसरी जगहों से भी वीडियो आने लगे. मध्य प्रदेश के बालाघाट में गांववाले टूटी खिड़कियों, गंदे शौचालयों और खराब पेयजल व्यवस्था की रील पोस्ट करते हैं. बेंगलूरू में वॉलंटियर सरकारी स्कूल जाकर शिक्षकों और अभिभावकों से बात करते हैं. ऑनलाइन निर्देश सीधा है: "जांचिए, पूछिए, सुनिए, रिकॉर्ड कीजिए." सीजेपी इसे स्कूल ठीक करो अभियान कहती है. माता-पिता, छात्रों और नागरिकों से स्थानीय सरकारी स्कूलों की जांच करने, कमियां दर्ज करने, सीजेपी को टैग करने और अधिकारियों से उन्हें ठीक कराने की मांग करने को कहा गया है. यह उसी तरीके का नया विस्तार है, जिसने सीजेपी को राष्ट्रीय पहचान दिलाईः युवाओं से जुड़ी शिकायत खोजो, रिकॉर्ड करो, ऑनलाइन डालो, आवाज बढ़ाओ, लोगों को जोड़ो और सरकार को कार्रवाई के लिए मजबूर करो.
बड़ी परीक्षा से पहले के बदलाव
विशाखापत्तनम जिले के गुडिलोवा में संघ परिवार की बैठक से दो दिन पहले भारतीय जनता पार्टी ने अपना सांगठनिक कायाकल्प शुरू किया. अखिल भारतीय समन्वय बैठक 19 से 21 अगस्त तक चली जिसमें संघ के 32 आनुषंगिक संगठन शामिल हुए. उन्होंने राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर विचार साझा किए, नितिन नवीन पहली बार इसमें बतौर भाजपा अध्यक्ष शामिल थे. एक सवाल वहां उनका इंतजार कर रहा था: पार्टी नेटवर्क मजबूत करने के लिए वे क्या कर रहे हैं? जवाब उन्होंने 17 अगस्त को ही खोज लिया था. क्या कुछ हटा दिया गया, यही उनके जवाब की सबसे बड़ी विशेषता थी. वरिष्ठ पदों पर टेलीविजन वाला कोई चेहरा नहीं, न ही बाहर से किसी सेलेब्रिटी को लाया गया. ग्यारह साल पार्टी के आइटी सेल और सोशल मीडिया का काम संभालने वाले अमित मालवीय हटा दिए गए, उसके सबसे चर्चित युवा नेता तेजस्वी सूर्या युवा मोर्चे से बाहर हैं. प्राइम टाइम के परिचित चेहरे संबित पात्रा को समन्वयक बनाकर उत्तरपूर्व भेज दिया गया है. नवीन के पास अब 64 पदाधिकारी हैं, जिनमें से कई नए हैं और ज्यादातर संसद की अगली कतारों से नहीं बल्कि राज्य इकाइयों से लाए गए हैं. पार्टी को पिछले कुछ महीने कड़े इम्तहान से गुजरना पड़ा. इसका जवाब उसने ऐसे लोगों को आगे लाकर दिया जो समझते हैं कि संगठन कैसे खड़ा किया जाता है, न कि ऐसे लोगों को जो टेलीविजन पर उसके बारे में समझा सकते हैं. अलबत्ता राजनैतिक बियाबान में भेज दिए गए कुछ जाने-माने चेहरों को वापस लाया गया है. आरएसएस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य राम माधव, जिन्हें 2020 में (कथित तौर पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ मतभेदों के कारण) हटा दिया गया था, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनकर लौटे तो 2024 में अमेठी से चुनाव हार गईं पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी राष्ट्रीय महासचिव बनाई गई हैं. नवीन के पूर्ववर्तियों ने भी कमान संभालने के बाद नई टीमें बनाई लेकिन 2026 की टीम कहीं ज्यादा गहरी काट-छांट के बाद बनी है. पूर्व पार्टी अध्यक्ष जे.पी. नड्डा की टीम में आठ महासचिव थे, जिनमें से मात्र दो, विनोद तावड़े और सुनील बंसल, ही बचे हैं. तेरह उपाध्यक्षों में से नौ नए हैं, तो 16 सचिवों में से 15 नए, सभी सातों मोचों के प्रमुख भी नए हैं. उधर, लगातार अच्छा काम कर रहे तरुण चुघ को केंद्रीय कार्यालय का प्रभारी बनाया गया है. उनसे पहले अरुण सिंह इस पद पर थे, जिन्हें पार्टी का बेशकीमती राज्य गुजरात सौंपा गया है. तावड़े को उत्तर प्रदेश दिया गया है. सतीश पूनिया को पंजाब मिला है, जहां जून 2025 में एयर इंडिया की विमान दुर्घटना में गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री विजय रूपानी की मृत्यु के बाद कोई राज्य प्रभारी नहीं था. सारे उलटफेर की एक निश्चित दिशा दिखाई देती है. नए नामों से भरे गए पद वे हैं जिनका सामना मतदाताओं से है, मजबूत किए गए पद वे हैं जो काडर और संगठन का निर्माण करते हैं. अतीत के सबक भाजपा ने 2024 में लोकसभा की 240 सीटें जीतकर अपना बहुमत गंवा दिया था. इससे तीन सबक निकाले गए और तीनों ही इस सूची में साफ देखे जा सकते हैं. पहले का वास्ता संघ के साथ रिश्ते सुधारने से है. ये रिश्ते मई 2024 में टूट गए थे जब लोकसभा चुनाव अभियान की चरम गहमागहमी में नड्डा ने एक इंटरव्यू में कह दिया था कि पार्टी आत्मनिर्भर है और अब उसे आरएसएस की जरूरत नहीं रह गई है. अब ये रिश्ते काफी हद तक सुधरे हैं, लेकिन संघ पूरी तरह साथ नहीं आया है. उसके बाद हुए राज्य विधानसभाओं के चुनाव अभियानों और संगठन में हुए इस फेरबदल, सभी से पता चलता है कि ज्यादातर फैसले लेने में संघ के संगठनों की सलाह ली जा रही है और उन्हें साथ रखा जा रहा है, मगर फासले अब