August 05, 2026
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जेन ज़ी का आक्रोश
दिल्ली के जंतर-मंतर पर तीन हफ्तों तक प्रदर्शनकारियों को नजरअंदाज किया जा सकता था, उनका मजाक उड़ाया जा सकता था या उन्हें एक और सोशल मीडिया तमाशा कहकर खारिज किया जा सकता था. यह सिलसिला 20 जुलाई को खत्म हुआ, जब मॉनसून सत्र के पहले दिन कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संसद मार्च के आह्वान पर हजारों-हजार लोग उमड़ पड़े. बैरिकेड गिर गए, मध्य दिल्ली में आंसू गैस फैल गई और एक अजीब-से नाम वाले आंदोलन ने खुद को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया. फौरी वजह थी नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट फॉर अंडरग्रेजुएट (नीट-यूजी) 2026 के प्रश्नपत्र का लीक होना. प्रदर्शनकारियों ने इस चूक की जवाबदेही के रूप में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांगा और उन छात्रों के लिए न्याय, जिन्हें उस व्यवस्था ने धोखा दिया जो उनकी सेवा के लिए बनी थी. जल्द ही नीट एक गंभीर विफलता का सबसे नुमायां संकेत बन गयाः लीक होती परीक्षाएं, रद्द होती भर्ती परीक्षाएं, खाली पड़े पद और तैयारी के वे साल, जिन्हें धोखाधड़ी, देरी या प्रशासनिक नाकामी के चलते खोना पड़ा.प्रदर्शनकारियों की यह विशाल संख्या जेन जी की थी, यानी 1997 से 2012 के बीच जन्मे युवा, और कमोवेश शांत. उनके हथियार थे पोस्टर, मीम्स और नारे. जब उनसे पूछा गया कि वे क्यों आए हैं, तो बहुत कम लोगों ने कहा कि वजह नीट पेपर लीक है. 26 साल की समरीन ने कहा, "कुछ भी तो ठीक से काम नहीं कर रहा. जिस हवा में आप सांस लेते हैं, वह जहरीली है. परीक्षाएं होतीं नहीं. होती हैं तो नतीजे आने में सालों लग जाते हैं. नौकरियां हैं नहीं. कोई सुनता नहीं. और जब आप बोलते हैं, तो वे पुलिस छोड़ देते हैं. क्या हम मुजरिम हैं?" थोड़ी देर और रुकिए तो गुस्सा शिकायतों की कई परतें खोलने लगता है: कि निष्पक्ष मौके नहीं हैं, कि डिग्री अब नौकरी की गारंटी नहीं देती, कि संस्थाएं जल्दी जवाब नहीं देतीं, गलतियां सुधारने में और देरी, और जिम्मेदार लोगों को सजा देने में सबसे ज्यादा देरी. इतना आक्रोश क्यों उनका गुस्सा उस परीक्षा व्यवस्था से भड़का, जो लाखों लोगों के धैर्य की परीक्षा लेती है. नीट-यूजी भारत में अंडरग्रेजुएट मेडिकल शिक्षा का एकमात्र प्रवेश द्वार है. तीन मई को 22.1 लाख से
बंगाल की खाड़ी में पाकिस्तान की चाल
भारत का पूर्वी किनारा हाल के वर्षों में भू-रणनीति की ज्वलंत जमीन बनकर उभरा है. लड़ाकू विमान और ड्रोन के लिए चीन के साथ बांग्लादेश के रक्षा सौदे और बंदरगाहों तथा हवाई क्षेत्रों को उन्नत बनाने के समझौते, साथ ही बांग्लादेश में पाकिस्तानी रक्षा और खुफिया मौजूदगी, सब इसी तरफ इशारा कर रहे हैं. दरअसल, संघर्ष के परिदृश्य पर बात करते हुए पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर ने अगस्त 2025 में कहा था, "हम पूरब से शुरू करेंगे..." पाकिस्तान भारत के अभी तक सुरक्षित पूर्वी तटों पर ठोस समुद्री उकसावों का संकेत दे रहा है. पाकिस्तान के लिए चीन में बनाई जा रही हैंगोर श्रेणी की आठ डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों में से पहली अप्रैल में पाकिस्तानी नौसेना में कमिशन की गई. पिछले महीने यह चीन से कोलंबो होते हुए कराची पहुंची. कोलंबो में एक नौसैनिक कार्यक्रम में पीएनएस हँगोर के मिशन एस्कोर्ट कमांडर कमोडोर उमर फारूक ने कहा कि नई पनडुब्बी से पाकिस्तान "बंगाल की खाड़ी में मौजूदगी बनाए रख सकेगा." भारत ने इसे गौर से सुना क्योंकि अगर यह सच है तो 1971 की जंग में अपने हाथ से पूर्वी समुद्री नियंत्रण खोने के बाद उस इलाके में यह पाकिस्तान की पहली नौसैनिक मौजूदगी होगी. तकरीबन 26 लाख वर्ग किमी में फैला बंगाल की खाड़ी का इलाका भारत की समुद्री सुरक्षा के लिहाज से केंद्रीय अहमियत रखता है. विशाखापत्तनम में भारत की पूर्वी नौसैन्य कमान और भारत का बेहद गोपनीय एटमी पनडुब्बी अड्डा आइएनएस वर्षा इसी इलाके में है. पाकिस्तानी पनडुब्बी की मौजूदगी से इन प्रतिष्ठानों की निगरानी से जुड़ी चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं. भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया को जोड़ने वाली संचार की प्रमुख समुद्री लाइने यहीं से होकर गुजरती हैं. ऐसे में यहां पाकिस्तान की कोई भी नौसैन्य मौजूदगी निश्चित तौर पर खतरा है. नौसेना के पर्यवेक्षकों का कहना है कि हैंगोर श्रेणी की पनडुब्बियों- चीन की युआन श्रेणी की पनडुब्बियों का निर्यात संस्करण - की बदौलत पाकिस्तान उत्तरी हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी में गोपनीय अभियानों को अंजाम दे पाएगा. अहम बात यह कि ये पनडुब्बियां एअर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (एआइपी) प्रणाली से लैस हैं, जिसकी बदौलत गैर-एटमी पनडुब्बियां लगातार तीन हफ्तों तक पानी में डूबी रह सकती हैं. विशेषज्ञ जोर देकर कहते हैं कि पाकिस्तान इन पनडुब्बियों का मुंह पूरब की तरफ रखकर भारत को पश्चिमी और पूर्वी दोनों समुद्रतटों की रक्षा एक साथ करने के लिए मजबूर कर देगा. हिंद महासागर में लगातार आक्रामक होती जाती चीन की गश्त के बीच पाकिस्तान का चीनी मूल की पनडुब्बियों का बेड़ा पीपल्स लिबरेशन आर्मी नैवी (पीएलएएन) के साथ मिलकर काम करने की उसकी क्षमता में खासा इजाफा ला सकता है. इस तरह बंगाल की खाड़ी में पाकिस्तान-चीन की लगातार समुद्री मौजूदगी का उभार भारत के लिए ज्यादा चिंता की बात है. संघर्ष की स्थिति में खाड़ी में मौजूद ये पनडुब्बियां व्यापारिक जहाजों और नौसैन्य अभियानों के लिए खतरा पैदा कर सकती हैं, जिनमें अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह की तरफ जाने वाले रास्ते भी शामिल हैं. नौसैन्य विशेषज्ञ बताते हैं कि पाकिस्तानी पनडुब्बियां 1971 से उत्तरी अरब सागर तक सिमटी रहीं. उस वक्त पीएनएस गाजी को कराची से बंगाल की खाड़ी में तैनात गया था, जहां वह डूबने से पहले कई दिनों तक विशाखापत्तनम के पास गश्त करती रही थी. पाकिस्तान की ताकत भारत के समुद्री वर्चस्व का मुकाबला करने और अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए पाकिस्तान अपनी नौसेना को आधुनिक बनाने के महत्वाकांक्षी कार्यक्रम पर आगे बढ़ रहा है. इसमें नए फ्रिगेट, कॉर्बेट, लंबी दूरी के समुद्री गश्ती विमान और साइबर तथा अंतरिक्ष को जोड़ना शामिल है. चीन-निर्मित हैंगोर श्रेणी की पनडुब्बियां इनमें सबसे प्रमुख हैं. पाकिस्तान ने पहली पनडुब्बी पीएनएस हँगोर नौसेना में शामिल कर ली है, जबकि पीएनएस/एम शुशुक, पीएनएस /एम मैंग्रो और पीएनएस/एम गाजी जल्द शामिल की जाएंगी. इन पनडुब्बियों में