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May 06, 2026

गतिरोध तोड़ने की राह

सत्रह अप्रैल की शाम नई लोकसभा में डिवीजन बेल बजी. ऊंची छत और मोर थीम वाला यह वही सदन था, जहां 31 महीने पहले जोरदार तालियों के बीच नरेंद्र मोदी सरकार ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित कराया था. उसमें लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसद सीटें आरक्षित की गई थीं. लेकिन इस बार माहौल बिल्कुल अलग था. तनाव, टकराव और सियासी खींचतान साफ दिख रही थी. जब स्पीकर ने नतीजा सुनाया—298 समर्थन में, 230 विरोध में—तो संविधान (131वां संशोधन) विधेयक जरूरी दो-तिहाई बहुमत से 60 से ज्यादा वोटों से पीछे रह गया. यह पहली बार था जब मोदी के दौर में कोई संवैधानिक संशोधन सदन में वोटिंग के दौरान गिर गया. इसकी गूंज संसद से बहुत दूर तक सुनाई दी. ऐसे में सवाल है कि जब आंकड़े खिलाफ दिख रहे थे, तब भी मोदी सरकार ने इतना बड़ा दांव क्यों खेला? सत्तारूढ़ दल की रणनीति कई लक्ष्यों को एक साथ साधने की लगती थी. सबसे बड़ा मकसद था नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 को जल्दी लागू करना. अगर कानून अपने ढर्रे चलते हुए आगे बढ़ता तो इसका अमल 2034 से पहले संभव न था. ऐसा इसलिए क्योंकि 2023 के कानून में साफ लिखा है कि महिला आरक्षण तभी लागू होगा जब कानून पास होने के बाद पहली जनगणना के आधार पर परिसीमन होगा. नए संशोधन बिल का मकसद इस लंबी समयसीमा को छोटा करना था. सरकार चाहती थी कि भविष्य की जनगणना से इसे अलग कर जल्दी लागू किया जाए. इसके साथ एक अलग बिल भी लाया गया, जिसमें निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन का रास्ता खोलने की बात थी. इसके पीछे तर्क यह था कि लोकसभा का आकार बढ़ाया जाए ताकि एक-तिहाई आरक्षण के लिए अतिरिक्त सीटें बनाई जा सकें और मौजूदा सीटों में कटौती या राजनैतिक टकराव से बचा जा सके. पर्यवेक्षकों के मुताबिक, यह दांव सत्तारूढ़ भाजपा को हर तरह से फायदे वाला लग रहा था. पार्टी को भरोसा था कि विपक्ष के लिए महिला आरक्षण से जुड़े बिल का विरोध करना राजनैतिक रूप से आसान नहीं होगा. भारत के कुल मतदाताओं में महिलाएं लगभग आधी हैं. ऐसे में अगर बिल पास हो जाता, तो 2029 में लगातार चौथी जीत की राह में भाजपा को बड़ी बढ़त मिल सकती थी. भाजपा सूत्रों के मुताबिक, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने फरवरी से ही प्रमुख विपक्षी नेताओं से संपर्क स शुरू कर दिया था. उन्होंने बिल पास कराने के लिए समर्थन मांगा और भरोसा दिलाया कि सरकार इस बात को लेकर संवेदनशील है कि दक्षिणी राज्यों के हित प्रभावित न हों. पार्टी को लगा कि विपक्ष की कई पार्टियां सहमत हैं इसलिए संशोधन बिल आगे बढ़ाया गया. लेकिन संसद में तस्वीर बदल गई. विपक्षी दलों ने रणनीति बदली और बिल का विरोध कर दिया. उनका आरोप था कि सरकार महिला आरक्षण को सिर्फ मुखौटे की तरह इस्तेमाल कर रही है ताकि देश को गुमराह किया जा सके. कांग्रेस का दावा था कि असली मकसद 2029 से पहले परिसीमन पूरा करना है, ताकि सत्ताधारी दल अपनी चुनावी सुविधा के हिसाब से सीटों की सीमाएं तय कर सके और जाति जनगणना के

अब नशे में उड़ता बिहार

पटना के एक नशामुक्ति केंद्र में पिछले दिनों 27- 28 साल के नंदू (बदला हुआ नाम) मिले. चेहरे पर सर्जरी के लंबे निशान थे. कहने लगे, एक्सीडेंट हो गया था. वे स्मैक के आदी हैं और नशे की हालत में बाइक चला रहे थे. यह बताते हुए ठंड के माहौल में भी उनके माथे पर पसीने की बूंदें दिख रही थीं. वे जब अपनी बात कहते हैं तो वाक्य टूटने लगते हैं. पूरा वाक्य कहने की क्षमता वे खो चुके हैं. नंदू अपनी लत के बारे में बताते हैं, मैं अब इसे छोड़ना चाहता हूं. मेरे तीन दोस्तों की मौत बारी-बारी से मेरे सामने हो गई. सबकी मौत नशे के ओवरडोज की वजह से हुई. मैं खुद हेपेटाइटिस बी और सी का मरीज हो गया हूं. इसी वजह से यहां आया हूं. मगर अभी तक भरोसा नहीं हुआ है

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